Sunday, August 30, 2020

१८. मलवग्गो


२३५.

पण्डुपलासोव दानिसि, यमपुरिसापि च ते [तं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] उपट्ठिता।

उय्योगमुखे च तिट्ठसि, पाथेय्यम्पि च ते न विज्‍जति॥

तुम इस समय पीले पत्ते की तरह हो, यमपुरुष (यमदूत) भी तुम्हारे पास उपस्थित है, तुम जाने के लिए तैयार हो , लेकिन तुम्हारे पास पाथेय (राहखर्च)  नहीं है ।

You are now

like a yellowed leaf.

         Already

Yama's minions stand near.

You stand at the door to departure

but have yet to provide

for the journey.

 

२३६.

सो करोहि दीपमत्तनो, खिप्पं वायम पण्डितो भव।

निद्धन्तमलो अनङ्गणो, दिब्बं अरियभूमिं उपेहिसि [दिब्बं अरियभूमिमेहिसि (सी॰ स्या॰ पी॰), दिब्बमरियभूमिं उपेहिसि (?)]

इसलिए अपने आपको द्वीप बनाओ, तत्परता से उद्योग करो, मल/ विकार दूर कर दोषरहित बनो। तब तुम श्रेष्ठ जनों के दिव्य लोक में जा पाओगे ।

Make an island for yourself!

Work quickly! Be wise!

With impurities all blown away,

         unblemished,

you'll reach the divine realm

of the noble ones.

 

२३७.

उपनीतवयो च दानिसि, सम्पयातोसि यमस्स सन्तिके।

वासो [वासोपि च (बहूसु)] ते नत्थि अन्तरा, पाथेय्यम्पि च ते न विज्‍जति॥

अब तुम्हारी उम्र पूरी हुई तुम यम के पास जा रहे हो, बीच में तुम्हारे लिए कोई आवास भी नहीं है और तुम्हारे पास कोई पाथेय भी नहीं है।


  You are now

right at the end of your time.

         You are headed

to Yama's presence,

with no place to rest along the way,

but have yet to provide

for the journey.

 

२३८.

सो करोहि दीपमत्तनो, खिप्पं वायम पण्डितो भव।

निद्धन्तमलो अनङ्गणो, न पुनं जातिजरं [न पुन जातिजरं (सी॰ स्या॰), न पुन जातिज्‍जरं (क॰)] उपेहिसि॥

इसलिए अपने आप को द्वीप बनाओ (ख़ुद अपना आश्रय/ शरण-स्थली बनो) , शीघ्र उद्यम करो, बुद्धिमान बनो, विकार छोड़कर दोषरहित बनो, तुम्हें फिर से जन्म और जरा से गुजरना नहीं पड़ेगा ।

Make an island for yourself!

Work quickly! Be wise!

With impurities all blown away,

         unblemished,

you won't again undergo birth

                & aging.

 

२३९.

अनुपुब्बेन मेधावी, थोकं थोकं खणे खणे।

कम्मारो रजतस्सेव, निद्धमे मलमत्तनो॥

समझदार व्यक्ति को अपने दोष क्रमशः, एक के बाद एक, धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा हटाते जाना चाहिए, जैसे सुनार चाँदी से मैल/अशुद्धि हटाता है।

 

Just as a silver smith

step by

step,

         bit by

         bit,

            moment to

            moment,

blows away the impurities

of molten silver —

so the wise man, his own.

 

 

२४०.

अयसाव मलं समुट्ठितं [समुट्ठाय (क॰)], ततुट्ठाय [तदुट्ठाय (सी॰ स्या॰ पी॰)] तमेव खादति।

एवं अतिधोनचारिनं, सानि कम्मानि [सककम्मानि (सी॰ पी॰)] नयन्ति दुग्गतिं॥

जैसे लोहे से ही उत्पन्न होने वाला मुरचा/जंग उसी को खा लेता है/नष्ट कर देता है, उसी प्रकार असंयत व्यक्ति को उसके कर्म ही दुर्गति तक पहुँचाते हैं।

Just as rust

 — iron's impurity —

eats the very iron

from which it is born,

         so the deeds

of one who lives slovenly

         lead him on

to a bad destination.

 

२४१.

असज्झायमला मन्ता, अनुट्ठानमला घरा।

मलं वण्णस्स कोसज्‍जं, पमादो रक्खतो मलं॥

स्वाध्याय न करना ( बार-बार अध्ययन न करना) मंत्रों (सूत्रों) का दोष है, साफ-सफ़ाई मरम्मत न करना घरों का दोष है, आलस्य शरीर का दोष है, असावधानी रक्षकों का दोष है।

No recitation: the ruinous impurity

                of chants.

No initiative: of a household.

Indolence: of beauty.

Heedlessness: of a guard.

 

२४२.

मलित्थिया दुच्‍चरितं, मच्छेरं ददतो मलं।

मला वे पापका धम्मा, अस्मिं लोके परम्हि च॥

 

स्त्रियों का दोष दुश्चरित है, दाता का दोष कृपणता (कंजूसी) है, पाप इस लोक और परलोक दोनों के दोष हैं।

 

In a woman, misconduct is an impurity.

In a donor, stinginess.

Evil deeds are the real impurities

in this world & the next.

 

२४३.

ततो मला मलतरं, अविज्‍जा परमं मलं।

एतं मलं पहन्त्वान, निम्मला होथ भिक्खवो॥

इन सबसे बड़ा दोष, महादोष, अविद्या/ अज्ञान है। भिक्षुओ, इस दोष को छोड़कर निर्मल बनो।

More impure than these impurities

is the ultimate impurity:

         ignorance.

Having abandoned this impurity,

monks, you're impurity-free.

 

 

२४४.

सुजीवं अहिरिकेन, काकसूरेन धंसिना।

पक्खन्दिना पगब्भेन, संकिलिट्ठेन जीवितं॥

निर्लज्ज, कौए के समान ढीठ, दूसरे को ध्वंस करनेवाला, पतित, उच्छृंखल, मलिन जीवन जीनेवालों का जीवन आसान होता है।

Life's easy to live

for someone unscrupulous,

         cunning as a crow,

         corrupt, back-biting,

         forward, & brash;

 

२४५.

हिरीमता च दुज्‍जीवं, निच्‍चं सुचिगवेसिना।

अलीनेनाप्पगब्भेन, सुद्धाजीवेन पस्सता॥

लेकिन जो  शर्म/हया/लिहाज़ रखते हैं, हमेशा पवित्रता का ध्यान रखते हैं, जो आलस्य नहीं करते, जो असंयमी नहीं हैं, जिनकी आजीविका शुद्ध है, जो सचेत हैं, उनका जीवन कठिन होता है।

but for someone who's constantly

         scrupulous, cautious,

         observant, sincere,

         pure in his livelihood,

         clean in his pursuits,

                it's hard.

 

 

२४६.

यो पाणमतिपातेति, मुसावादञ्‍च भासति।

लोके अदिन्‍नमादियति, परदारञ्‍च गच्छति॥

जो जीवहत्या करता है, झूठ बोलता है, संसार में जो उसे नहीं दिया गया है, उसे लेता है, परस्त्रीगमन करता है,

 

Whoever kills, lies, steals,

goes to someone else's wife,

 

२४७.

सुरामेरयपानञ्‍च, यो नरो अनुयुञ्‍जति।

इधेवमेसो लोकस्मिं, मूलं खणति अत्तनो।

जो पुरुष सुरापान में डूबा रहता है, समझो कि उसने इसी लोक में अपनी जड़ खोद ली।

 

& is addicted to intoxicants,

         digs himself up

         by the root

right here in this world.

 

२४८.

एवं भो पुरिस जानाहि, पापधम्मा असञ्‍ञता।

मा तं लोभो अधम्मो च, चिरं दुक्खाय रन्धयुं॥

इसलिए हे पुरुष पापियों और असंयमियों के बारे में ऐसा जानकर अपने आपको लोभ और अधर्म से चिरकाल तक होनेवाले दुख से बचा।

So know, my good man,

that bad deeds are reckless.

Don't let greed & unrighteousness

oppress you with long-term pain.

 

२४९.

ददाति वे यथासद्धं, यथापसादनं [यत्थ पसादनं (कत्थचि)] जनो।

तत्थ यो मङ्कु भवति [तत्थ चे मंकु यो होति (सी॰), तत्थ यो मङ्कुतो होति (स्या॰)], परेसं पानभोजने।

न सो दिवा वा रत्तिं वा, समाधिमधिगच्छति॥

लोग श्रद्धा और प्रसन्नता के अनुसार देते हैं। अतः जो दूसरों को मिलने वाले भोजन-पेय को देखकर (ईर्ष्या से ) मूक हो जाता है, वह दिन या रात कभी भी समाधि प्राप्त नहीं करता। 

People give

in line with their faith,

in line with conviction.

Whoever gets flustered

at food & drink given to others,

attains no concentration

by day or by night.

 

२५०.

यस्स चेतं समुच्छिन्‍नं, मूलघच्‍चं [मूलघच्छं (क॰)] समूहतं।

स वे दिवा वा रत्तिं वा, समाधिमधिगच्छति॥

लेकिन जिसमें ईर्ष्या जड़-मूल से उच्छिन्न हो गयी है, वह दिन रात समाधि में रहता है।

But one in whom this is

         cut    through

         up-    rooted

         wiped out —

attains concentration

by day or by night.

 

२५१.

नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो गहो।

नत्थि मोहसमं जालं, नत्थि तण्हासमा नदी॥

राग के समान आग नहीं, द्वेष के समान ग्रह (आपदा) नहीं, मोह के समान जाल नहीं, तृष्णा के समान नदी नहीं ।

There's no fire like passion,

no seizure like anger,

no snare like delusion,

no river like craving.

 

२५२.

सुदस्सं वज्‍जमञ्‍ञेसं, अत्तनो पन दुद्दसं।

परेसं हि सो वज्‍जानि, ओपुनाति [ओफुनाति (क॰)] यथा भुसं।

अत्तनो पन छादेति, कलिंव कितवा सठो॥

दूसरों का दोष देखना आसान है, अपना दोष देखना अत्यंत कठिन। दूसरों के दोषों को लोग भूसे की तरह उड़ाते हैं (चारों तरफ़ प्रचार करते हैं), जबकि अपने दोषों को ऐसे छुपाते हैं, जैसे जुआरी पाँसे को छुपाता है।

It's easy to see

the errors of others,

but hard to see

your own.

You winnow like chaff

the errors of others,

but conceal your own —

like a cheat, an unlucky throw.

 

 

२५३.

परवज्‍जानुपस्सिस्स , निच्‍चं उज्झानसञ्‍ञिनो।

आसवा तस्स वड्ढन्ति, आरा सो आसवक्खया॥

दूसरों के दोष देखने वाले,  दूसरों के दोषों पर हायतौबा मचानेवाले के आस्रव (चित्तविकार) बढ़ते हैं, उनके आस्रव घटते नहीं हैं।

If you focus on the errors of others,

constantly finding fault,

your effluents flourish.

You're far from their ending.

 

 

२५४.

आकासेव पदं नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे।

पपञ्‍चाभिरता पजा, निप्पपञ्‍चा तथागता॥

आकाश में कोई पदचिह्न नहीं रहता, श्रमण (संघ से )बाहर नहीं मिलते, प्रजा प्रपंचों से भरी रहती है, तथागत में कोई प्रपंच नहीं रहता।

There's no trail in space,

no outside contemplative.

People are smitten

with objectifications,

but devoid of objectification are

the Tathagatas.

 

२५५.

आकासेव पदं नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे।

सङ्खारा सस्सता नत्थि, नत्थि बुद्धानमिञ्‍जितं॥

आकाश में कोई पदचिह्न नहीं रहता, श्रमण (संघ से ) बाहर नहीं मिलते, संस्कार शाश्वत नहीं होते, बुद्ध में अस्थिरता नहीं रहती।

There's no trail in space,

no outside contemplative,

no eternal fabrications,

no wavering in the Awakened.

 

 

Malavagga: Impurities" (Dhp XVIII), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.18.than.html .

 

हिन्दी अनुवाद: राजीव 

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