Tuesday, January 1, 2013

पुप्फवग्गो



४४.
को इमं [कोमं (क॰)] पथविं विचेस्सति [विजेस्सति (सी॰ स्या॰ पी॰)], यमलोकञ्‍च इमं सदेवकं।
को धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति [पुप्फमिवप्पचेस्सति (क॰)]
इस पृथ्वी, यमलोक और देवलोक को कौन समझेगा? कौन इस सुआख्यायित ( अच्छी तरह से समझाए गये) धर्म के मर्म को समझेगा, जैसे कुशल मालाकार फूलों को समझता है? 
Who will penetrate this earth & this realm of death with all its gods? Who will ferret out the well-taught Dhamma-saying, as the skillful flower-arranger the flower?


४५.
सेखो पथविं विचेस्सति, यमलोकञ्‍च इमं सदेवकं।
सेखो धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति॥

इस पृथ्वी, यमलोक और देवलोक को वह समझेगा, जो सीखता है।सीखने वाला ही इस सुआख्यायित ( अच्छी तरह से समझाए गये) धर्म के मर्म को समझेगा, जैसे कुशल मालाकार फूलों को समझता है। 
The learner-on-the-path will penetrate this earth & this realm of death with all its gods. The learner-on-the-path will ferret out the well-taught Dhamma-saying, as the skillful flower-arranger the flower.


४६.
फेणूपमं कायमिमं विदित्वा, मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो।
छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि [सपुप्फकानि (टीका)], अदस्सनं मच्‍चुराजस्स गच्छे॥

इस काया को फेण (बुलबुले) के समान जानकर, इस अस्तित्व को मरीचिका (मृगतृष्णा) समझकर,  मार के पुष्पवाणों को काटकर तुम वहां जाओ जो यमदेवता की नजरों से दूर है।
Knowing this body is like foam, realizing its nature — a mirage — cutting out the blossoms of Mara, you go where the King of Death can't see.


४७.
पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं [ब्यासत्तमानसं (क॰)] नरं।
सुत्तं गामं महोघोव, मच्‍चु आदाय गच्छति॥
जिस व्यक्ति का मन फूल चुनने ( सुख खोजने) में विशेष रूप से आसक्त है, उसे मृत्यु वैसे ही ले जाती है, जैसे सोए हुए गाँव को भीषण बाढ़।
The man immersed in gathering blossoms, his heart distracted: death sweeps him away — as a great flood, a village asleep.
४८.
पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं नरं।
अतित्तञ्‍ञेव कामेसु, अन्तको कुरुते वसं॥

जिस व्यक्ति का मन फूल चुनने ( सुख खोजने) में विशेष रूप से आसक्त है, ऐसी अतृप्त इच्छा वाले व्यक्ति को मृत्यु अपने वश में कर लेती है।
The man immersed in gathering blossoms, his heart distracted, insatiable in sensual pleasures: the End-Maker holds him under his sway.
४९.
यथापि भमरो पुप्फं, वण्णगन्धमहेठयं [वण्णगन्धमपोठयं (क॰)]
पलेति रसमादाय, एवं गामे मुनी चरे॥

जैसे भ्रमर फूल के वर्ण और गन्ध को नुकसान पहुँचाये बिना रस ग्रहण कर  उड़ जाता है, वैसे ही मुनि गाँव में जाए।
As a bee — without harming the blossom, its color, its fragrance — takes its nectar & flies away: so should the sage go through a village.
५०.
न परेसं विलोमानि, न परेसं कताकतं।
अत्तनोव अवेक्खेय्य, कतानि अकतानि च॥


आदमी न दूसरों के दोष देखे, न दूसरों का कृत अकृत देखे। उसे अपना ही कृत अकृत  देखना चाहिए।
Focus, not on the rudenesses of others, not on what they've done or left undone, but on what you have & haven't done yourself.
५१.
यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं अगन्धकं।
एवं सुभासिता वाचा, अफला होति अकुब्बतो॥

जैसे आकर्षक रंग वाला फूल गंधहीन हो, वैसे ही सुभाषित (अच्छी तरह बोला गया) वचन भी निष्फल है यदि उसके अनुसार कर्म न किया गया हो।
Just like a blossom, bright colored but scentless: a well-spoken word is fruitless when not carried out.
५२.
यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं सुगन्धकं [सगन्धकं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
एवं सुभासिता वाचा, सफला होति कुब्बतो [सकुब्बतो (सी॰ पी॰), पकुब्बतो (सी॰ अट्ठ॰), सुकुब्बतो (स्या॰ कं॰)]

जैसे आकर्षक रंग वाला फूल सुगंधित भी हो, वैसे ही सुभाषित (अच्छी तरह बोला गया) वचन सफल होता है यदि उसके अनुसार कर्म किया गया हो।

Just like a blossom, bright colored & full of scent: a well-spoken word is fruitful when well carried out.
५३.
यथापि पुप्फरासिम्हा, कयिरा मालागुणे बहू।
एवं जातेन मच्‍चेन, कत्तब्बं कुसलं बहुं॥

जैसे पुष्पराशियों ( फूलों की ढेर) में से अनेक मालाएँ गुँथी जा सकती हैं, वैसे ही मरणशील मानव को जन्म लेने के बाद अनेक अच्छे कर्म करने चाहिए।
Just as from a heap of flowers many garland strands can be made, even so one born & mortal should do — with what's born & is mortal — many a skillful thing.
५४.
न पुप्फगन्धो पटिवातमेति, न चन्दनं तगरमल्‍लिका [तगरमल्‍लिका (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
सतञ्‍च गन्धो पटिवातमेति, सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति॥


फूल, चन्दन, तगर, मल्लिका की गंध हवा की विपरीत दिशा में नहीं जाती। अच्छाई की सुगंध हवा के विरुद्ध जाती है। सद्पुरुष के गुण सभी दिशाओं में प्रवाहित होते हैं।



No flower's scent goes against the wind — not sandalwood, jasmine, tagara. But the scent of the good does go against the wind. The person of integrity wafts a scent in every direction

५५.
चन्दनं तगरं वापि, उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं, सीलगन्धो अनुत्तरो॥

चन्दन, तगर, नील कमल, चमेली - इन सभी सुगन्धों से बढ़कर शील (गुणौं) की सुगन्ध है।

Sandalwood, tagara, lotus, & jasmine: Among these scents, the scent of virtue is unsurpassed.



५६.
अप्पमत्तो अयं गन्धो, य्वायं तगरचन्दनं [यायं तगरचन्दनी (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
यो च सीलवतं गन्धो, वाति देवेसु उत्तमो॥

तगर और चन्दन की यह गंध सीमित है, लेकिन शीलवान पुरुष की गंध उत्तम है - वह देवताओं तक पहुँचती है।
Next to nothing, this fragrance — sandalwood, tagara — while the scent of the virtuous wafts to the gods, supreme.
५७.
तेसं सम्पन्‍नसीलानं, अप्पमादविहारिनं।
सम्मदञ्‍ञा विमुत्तानं, मारो मग्गं न विन्दति॥

उस शीलसंपन्न , अप्रमादविहारी ( जो हमेशा अप्रमादपूर्वक जीता है), सम्यक ज्ञान के कारण विमुक्त हुए व्यक्ति के पथ को मार नहीं पहचानता।
Those consummate in virtue, dwelling in heedfulness, released through right knowing: Mara can't follow their tracks.
५८.
यथा सङ्कारठानस्मिं [सङ्कारधानस्मिं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)], उज्झितस्मिं महापथे।
पदुमं तत्थ जायेथ, सुचिगन्धं मनोरमं॥

जैसे राजमार्ग के किनारे फेंके गये कूड़े की ढेर में एक पवित्र गंध वाला मनोरम कमल खिल सकता है;

As in a pile of rubbish cast by the side of a highway a lotus might grow clean-smelling pleasing the heart,

५९.
एवं सङ्कारभूतेसु, अन्धभूते [अन्धीभूते (क॰)] पुथुज्‍जने।
अतिरोचति पञ्‍ञाय, सम्मासम्बुद्धसावको॥

उसी प्रकार सम्यक सम्बुद्ध (बुद्ध) का श्रावक (शिष्य) अति साधारण दृष्टिहीन जनों के बीच अपनी प्रज्ञा के कारण शोभा पाता है।



so in the midst of the rubbish-like, people run-of-the-mill & blind, there dazzles with discernment the disciple of the Rightly Self-Awakened One.
पुप्फवग्गो चतुत्थो निट्ठितो।

No comments:

Post a Comment