Thursday, January 3, 2013

पण्डितवग्गो



७६.
निधीनंव पवत्तारं, यं पस्से वज्‍जदस्सिनं।
निग्गय्हवादिं मेधाविं, तादिसं पण्डितं भजे।
तादिसं भजमानस्स, सेय्यो होति न पापियो॥

यदि कोई ऐसा मेधावी (प्रज्ञावन्त) मिले जो आपकी कमियों की ओर इशारा करे और आपको डाँटे, तो उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जानें जो किसी खजाने का रास्ता दिखाता है। ऐसे पण्डित की संगति में रहना चाहिए। यह संगति शुभकारक होती है, पापकारक नहीं।
Regard him as one who points out treasure, the wise one who seeing your faults rebukes you. Stay with this sort of sage. For the one who stays with a sage of this sort, things get better, not worse.

७७.
ओवदेय्यानुसासेय्य, असब्भा च निवारये।
सतञ्हि सो पियो होति, असतं होति अप्पियो॥

वह डाँटेगा, अनुशासित करेगा और अशोभनीय से दूर रखेगा। अच्छे लोगों के लिए वह प्रिय है, बुरे लोगों के लिए वह अप्रिय है।
Let him admonish, instruct, deflect you away from poor manners. To the good, he's endearing; to the bad, he's not.
७८.
न भजे पापके मित्ते, न भजे पुरिसाधमे।
भजेथ मित्ते कल्याणे, भजेथ पुरिसुत्तमे॥

बुरे मित्रों के साथ न रहें, नीच लोगों के साथ न रहें। कल्याण मित्र (ऐसा मित्र जो आपके कल्याण में सहायक हो) के साथ रहें, अच्छे लोगों के साथ रहें।
Don't associate with bad friends. Don't associate with the low. Associate with admirable friends. Associate with the best.
७९.
धम्मपीति सुखं सेति, विप्पसन्‍नेन चेतसा।
अरियप्पवेदिते धम्मे, सदा रमति पण्डितो॥

जो धर्मपान करता है (धर्म के अनुसार निरन्तर आचरण करता है) वह  निर्मल चित्त के साथ सुख से जीता है। पण्डित श्रेष्ठ जनों द्वारा प्रकाशित धर्म में सदा रमन करते हैं।
Drinking the Dhamma, refreshed by the Dhamma, one sleeps at ease with clear awareness & calm. In the Dhamma revealed by the noble ones, the wise person always delights.
८०.
उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति [दमयन्ति (क॰)] तेजनं।
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति पण्डिता॥

मेँड़ बनाने वाले पानी को दिशा देते हैं, बाण बनाने वाले   बाण को आकार देते हैं, बढ़ई लकड़ी को आकार देते हैं, पण्डित ( अपने आपको आकार देते हैं), अपने आप पर ही नियंत्रण रखते हैं।
Irrigators guide the water. Fletchers shape the arrow shaft. Carpenters shape the wood. The wise control themselves.
८१.
सेलो यथा एकघनो [एकग्घनो (क॰)], वातेन न समीरति।
एवं निन्दापसंसासु, न समिञ्‍जन्ति पण्डिता॥

जैसे एक ठोस चट्टान हवा से नहीं हिलायी जा सकती, वैसे ही पण्डित निन्दा-प्रशंसा से विचलित नहीं होते।  
As a single slab of rock won't budge in the wind, so the wise are not moved by praise, by blame.
८२.
 
यथापि रहदो गम्भीरो, विप्पसन्‍नो अनाविलो।
एवं धम्मानि सुत्वान, विप्पसीदन्ति पण्डिता॥

जैसे एक गहरी झील निर्मल और शान्त होती है, वैसे ही धर्म सुनकर पण्डित शान्त हो जाते हैं। 
Like a deep lake, clear, unruffled, & calm: so the wise become clear, calm, on hearing words of the Dhamma.
८३.
सब्बत्थ वे सप्पुरिसा चजन्ति, न कामकामा लपयन्ति सन्तो।
सुखेन फुट्ठा अथ वा दुखेन, न उच्‍चावचं [नोच्‍चावचं (सी॰ अट्ठ॰)] पण्डिता दस्सयन्ति॥

सद्पुरुष सभी चीजों का त्याग करते हैं, वे किसी सुख के लिए लालायित नहीं रहते, सुख अथवा दुख के स्पर्श से वे अत्यन्त प्रफुल्लित या विषन्न नहीं होते।
Everywhere, truly, those of integrity stand apart. They, the good, don't chatter in hopes of favor or gains. When touched now by pleasure, now pain, the wise give no sign of high or low.
८४.
न अत्तहेतु न परस्स हेतु, न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं।
न इच्छेय्य [नयिच्छे (पी॰), निच्छे (?)] अधम्मेन समिद्धिमत्तनो, स सीलवा पञ्‍ञवा धम्मिको सिया॥

जो न अपने खातिर और न दूसरे के खातिर पुत्र या धन या राज्य की इच्छा करता है, जो अधर्म के मार्ग से अपनी समृद्धि नहीं चाहता वही शीलवान, प्रज्ञावान और धार्मिक है। 
one who wouldn't — not for his own sake nor that of another — hanker for wealth, a son, a kingdom, his own fulfillment, by unrighteous means: he is righteous, rich in virtue, discernment.
८५.
अप्पका ते मनुस्सेसु, ये जना पारगामिनो।
अथायं इतरा पजा, तीरमेवानुधावति॥

मनुष्यों में ऐसे लोग कम हैं जो इस संसार रूपी नदी के पार जाते हैं ( जो मुक्ति पाते हैं)। शेष जनसमुदाय किनारे पर  ही इधर से उधर दौड़ता रहता है। 
Few are the people who reach the Far Shore. These others simply scurry along this shore.
८६.
ये च खो सम्मदक्खाते, धम्मे धम्मानुवत्तिनो।
ते जना पारमेस्सन्ति, मच्‍चुधेय्यं सुदुत्तरं॥

जो अच्छी तरह से कहे गये इस धर्म का अनुसरण करते हैं, वे इस दुस्तर मृत्युलोक को पार करते हैं।
But those who practice Dhamma in line with the well-taught Dhamma, will cross over the realm of Death so hard to transcend.
८७.
कण्हं धम्मं विप्पहाय, सुक्‍कं भावेथ पण्डितो।
ओका अनोकमागम्म, विवेके यत्थ दूरमं॥


पण्डित को कृष्ण धर्म  छोड़कर शुक्ल धर्म  विकसित करना चाहिए। उसे घर से बेघर होकर विवेक ( अनासक्ति, विराग, एकान्त) में रमना चाहिए, जो अत्यंत कठिन है। 
 Forsaking dark practices, the wise person should develop the bright, having gone from home to no-home in seclusion, so hard to enjoy.
८८.
तत्राभिरतिमिच्छेय्य, हित्वा कामे अकिञ्‍चनो।
परियोदपेय्य [परियोदापेय्य (?)] अत्तानं, चित्तक्‍लेसेहि पण्डितो॥

उस अकिंचन को कामभाव छोड़कर उस एकान्त में सुख खोजने की इच्छा रखनी चाहिए। पण्डित को अपने चित्त को विकारों से मुक्त करना चाहिए। 
There he should wish for delight, discarding sensuality — he who has nothing. He should cleanse himself — wise — of what defiles the mind.
८९.
येसं सम्बोधियङ्गेसु, सम्मा चित्तं सुभावितं।
आदानपटिनिस्सग्गे, अनुपादाय ये रता।
खीणासवा जुतिमन्तो, ते लोके परिनिब्बुता॥

जिनका चित्त सम्बोधि के अंगों को अच्छी तरह विकसित कर चुका है, जो विराग और अनासक्ति में रत हैं, जिनके विकार क्षीण हो गये हैं, ऐसे ज्योतिमन्त लोग इस लोक में विमुक्त हैं।
Whose minds are well-developed in the factors of self-awakening, who delight in non-clinging, relinquishing grasping — resplendent, their effluents ended: they, in the world, are Unbound.
पण्डितवग्गो छट्ठो निट्ठितो

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