सुसुखं वत जीवाम, वेरिनेसु अवेरिनो।
वेरिनेसु मनुस्सेसु, विहराम अवेरिनो॥
हम वैरियों के बीच अवैरी ( जो किसी से भी शत्रुता नहीं करता) रहकर कितने सुखपूर्वक जी रहे हैं! वैरी मनुष्यों के बीच हम अवैरी विहार करते हैं।
How very happily we live,
free from hostility
among those who are hostile.
Among hostile people,
free from hostility we dwell.
सुसुखं वत जीवाम, आतुरेसु अनातुरा।
आतुरेसु मनुस्सेसु, विहराम अनातुरा॥
हम आतुरों ( भोग-विलास के आतुर) के बीच अनातुर होकर कितने सुखपूर्वक जीते हैं! आतुर मनुष्यों के बीच हम अनातुर रहकर विहार करते हैं।
How very happily we live,
free from misery
among those who are miserable.
Among miserable people,
free from misery we dwell.
सुसुखं वत जीवाम, उस्सुकेसु अनुस्सुका।
उस्सुकेसु मनस्सेसु, विहराम अनुस्सुका॥
हम उत्सुकों के बीच अनुत्सुक रहकर कितने सुखपूर्वक जीते हैं! उत्सुक मनुष्यों के बीच हम अनुत्सुक होकर विहार करते हैं।
( यहाँ उत्सुकता का अर्थ सम्भवतः निरर्थक जिज्ञासा से है।)
How very happily we live,
free from busyness
among those who are busy.
Among busy people,
free from busyness we dwell.
सुसुखं वत जीवाम, येसं नो नत्थि किञ्चनं।
पीतिभक्खा भविस्साम, देवा आभस्सरा यथा॥
हम, जिनके पास कुछ भी नहीं है, कितने सुखपूर्वक जी रहे हैं! हम आभास्वर देवता की तरह केवल प्रीति (आनन्द, रस) के आहार पर ज़िन्दा रहेंगे।
How very happily we live,
we who have nothing.
We will feed on rapture
like the Radiant gods.
जयं वेरं पसवति, दुक्खं सेति पराजितो।
उपसन्तो सुखं सेति, हित्वा जयपराजयं॥
जय से वैर उत्पन्न होता है। पराजित व्यक्ति दुख/पीड़ा में सोता है। जिन्होंने अपने आप को शान्त कर लिया है, वे जय- पराजय को छोड़कर सुखपूर्वक जीते हैं।
Winning gives birth to hostility.
Losing, one lies down in pain.
The calmed lie down with ease,
having set
winning & losing
aside.
नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि।
नत्थि खन्धसमा [खन्धादिसा (सी॰ स्या॰ पी॰ रूपसिद्धिया समेति)] दुक्खा, नत्थि सन्तिपरं सुखं॥
राग (लोभ, तृष्णा आदि) के समान कोई अग्नि नहीं है। द्वेष (घृणा, क्रोध) के समान कोई मल (गंदगी) नहीं है। पंचस्कन्ध के समान दुख नहीं। शान्ति से बढ़कर कोई सुख नहीं।
( पंचस्कन्ध अर्थात् रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान।)
There's no fire like passion,
no loss like anger,
no pain like the aggregates,
no ease other than peace.
जिघच्छापरमा रोगा, सङ्खारपरमा [सङ्कारा परमा (बहूसु)] दुखा।
एतं ञत्वा यथाभूतं, निब्बानं परमं सुखं॥
भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़ा दुख है। जो इस सत्य को जानता है, उसके लिए निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
Hunger: the foremost illness.
Fabrications: the foremost pain.
For one knowing this truth
as it actually is,
Unbinding
is the foremost ease.
आरोग्यपरमा लाभा, सन्तुट्ठिपरमं धनं।
विस्सासपरमा ञाति [विस्सासपरमो ञाति (क॰ सी॰), विस्सासपरमा ञाती (सी॰ अट्ठ॰), विस्सासा परमा ञाति (क॰)], निब्बानं परमं [निब्बाणपरमं (क॰ सी॰)] सुखं॥
आरोग्य (रोग से मुक्ति ) सबसे बड़ा लाभ है। सन्तोष सबसे बड़ा धन है। विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है और निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
Freedom from illness: the foremost good fortune.
Contentment: the foremost wealth.
Trust: the foremost kinship.
Unbinding: the foremost ease.
पविवेकरसं पित्वा [पीत्वा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)], रसं उपसमस्स च।
निद्दरो होति निप्पापो, धम्मपीतिरसं पिवं॥
एकान्त का रस पीकर, उपशम (विकारों की शान्ति) का रस पीकर, धर्म और प्रीति का रस पीकर व्यक्ति निडर और निष्पाप बनता है।
Drinking the nourishment,
the flavor,
of seclusion & calm,
one is freed from evil, devoid
of distress,
refreshed with the nourishment
of rapture in the Dhamma.
साहु दस्सनमरियानं, सन्निवासो सदा सुखो।
अदस्सनेन बालानं, निच्चमेव सुखी सिया॥
आर्य (श्रेष्ठ) पुरुषों का दर्शन शुभ है, सज्जनों के संग रहना हमेशा सुखद है। मूर्खों का दर्शन न हो तो निरन्तर सुख मिलता है।
It's good to see Noble Ones.
Happy their company — always.
Through not seeing fools
constantly, constantly
one would be happy.
बालसङ्गतचारी [बालसङ्गतिचारी (क॰)] हि, दीघमद्धान सोचति।
दुक्खो बालेहि संवासो, अमित्तेनेव सब्बदा।
धीरो च सुखसंवासो, ञातीनंव समागमो॥
मूर्खों के साथ रहने वाला दीर्घ काल तक शोक करता है। मूर्खों के साथ संभाषण/ संवाद किसी शत्रु के साथ संवाद जैसा ही हमेशा पीड़ादायक होता है। धीर(ज्ञानी) के साथ संभाषण सुखकर होता है, जैसे अपने बन्धुओं के साथ मिलना-जुलना प्रीतिकर होता है।
For, living with a fool,
one grieves a long time.
Painful is communion with fools,
as with an enemy —
always.
Happy is communion
with the enlightened,
as with a gathering of kin.
तस्मा हि –
धीरञ्च पञ्ञञ्च बहुस्सुतञ्च, धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं, भजेथ नक्खत्तपथंव चन्दिमा [तस्मा हि धीरं पञ्ञञ्च, बहुस्सुतञ्च धोरय्हं। सीलं धुतवतमरियं, तं तादिसं सप्पुरिसं। सुमेधं भजेथ नक्खत्तपथंव चन्दिमा। (क॰)]॥
इसलिए, धीर, प्राज्ञ, बहुश्रुत, उद्योगी, व्रती, आर्य (श्रेष्ठ)पुरुषों के और उन जैसे ही विवेकी सत्पुरुषों के मार्ग का उसी प्रकार अनुसरण करना चाहिए, जैसे चन्द्रमा नक्षत्र पथ का अनुसरण करता है।
So:
the enlightened man —
discerning, learned,
enduring, dutiful, noble,
intelligent, a man of integrity:
follow him
— one of this sort —
as the moon, the path
of the zodiac stars.
सुखवग्गो पन्नरसमो निट्ठितो।
English translation: "Sukhavagga: Happy" (Dhp XV), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.15.than.html .
हिन्दी अनुवाद: राजीव
No comments:
Post a Comment