कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं, संयोजनं सब्बमतिक्कमेय्य।
तं नामरूपस्मिमसज्जमानं, अकिञ्चनं नानुपतन्ति दुक्खा॥
क्रोध छोड़ें, मान न करें, सभी संयोजनों (बन्धनों) का अतिक्रमण करें। नाम-रूप से जो अनासक्त है, ऐसे अकिंचन (विनम्र, अपरिग्रही) जन को दुःख नहीं सताता है ।
be done with conceit,
get beyond every fetter.
When for name & form
you have no attachment
— have nothing at all —
no sufferings, no stresses, invade.
२२२.
यो वे उप्पतितं कोधं, रथं भन्तंव वारये [धारये (सी॰ स्या॰ पी॰)]।
तमहं सारथिं ब्रूमि, रस्मिग्गाहो इतरो जनो॥
जो चढ़ते क्रोध को उसी प्रकार नियंत्रित करता है, जैसे तेज गति से दौड़ने वाले रथ को नियंत्रित किया जाता है, मैं उसको सारथि कहूँगा । बाक़ी लोग तो केवल रस्सी पकड़े हुए हैं।
When anger arises,
whoever keeps firm control
as if with a racing chariot:
him
I call a master charioteer.
Anyone else,
a rein-holder —
that's all.
अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने।
जिने कदरियं दानेन, सच्चेनालिकवादिनं॥
क्रोध को अक्रोध से जीतो, बुराई को अच्छाई से जीतो, कंजूसी को दान से जीतो, मिथ्यावादी को सत्य से जीतो ।
Conquer anger
with lack of anger;
bad, with good;
stinginess, with a gift;
a liar, with truth.
सच्चं भणे न कुज्झेय्य, दज्जा अप्पम्पि [दज्जा’प्पस्मिम्पि (सी॰ पी॰), दज्जा अप्पस्मि (स्या॰ क॰)] याचितो।
एतेहि तीहि ठानेहि, गच्छे देवान सन्तिके॥
सत्य बोले, क्रोध न करे और माँगने पर थोड़ा भी हो तो दे। इन तीन बातों का पालन करने वाला देवताओं के पास जाता है।
By telling the truth;
by not growing angry;
by giving, when asked,
no matter how little you have:
by these three things
you enter the presence of devas.
अहिंसका ये मुनयो [अहिंसकाया मुनयो (क॰)], निच्चं कायेन संवुता।
ते यन्ति अच्चुतं ठानं, यत्थ गन्त्वा न सोचरे॥
जो मुनि अहिंसक हैं, जो नित्य शरीर संयम करते हैं, वे एक अच्युत स्थान ( जहाँ से कोई पथभ्रष्ट नहीं हो सकता) प्राप्त करते हैं, जहाँ पहुँचकर उसे कोई शोक नहीं होता।
Gentle sages,
constantly restrained in body,
go to the unwavering state
where, having gone,
there's no grief.
सदा जागरमानानं, अहोरत्तानुसिक्खिनं।
निब्बानं अधिमुत्तानं, अत्थं गच्छन्ति आसवा॥
जो सदा जाग्रत (सचेत) रहते हैं, दिन-रात सीखने में लगे रहते हैं, जो निर्वाण के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं, उनके विकार नष्ट हो जाते हैं।
Those who always stay wakeful,
training by day & by night,
keen on Unbinding:
their effluents come to an end.
पोराणमेतं अतुल, नेतं अज्जतनामिव।
निन्दन्ति तुण्हिमासीनं, निन्दन्ति बहुभाणिनं।
मितभाणिम्पि निन्दन्ति, नत्थि लोके अनिन्दितो॥
हे अतुल, (जिस व्यक्ति/उपासक को यह शिक्षा दी गयी, उसका नाम), यह आज की बात नहीं है, पुरातन काल से ही ऐसा होता आ रहा है कि लोग चुपचाप बैठे हुए की निन्दा करते हैं, अधिक बोलने वाले की निन्दा करते हैं, मितभाषी की निन्दा करते हैं । ऐसा कोई नहीं है जिसकी इस संसार में निन्दा नहीं होती है।
This has come down from old, Atula,
& not just from today:
they find fault with one
who sits silent,
they find fault with one
who speaks a great deal,
they find fault with one
who measures his words.
There's no one unfaulted in the world.
न चाहु न च भविस्सति, न चेतरहि विज्जति।
एकन्तं निन्दितो पोसो, एकन्तं वा पसंसितो॥
ऐसा व्यक्ति न हुआ है, न होगा और न आज विद्यमान है, जिसकी केवल निन्दा ही हो या जिसकी केवल बड़ाई ही हो।
There never was,
will be,
nor at present is found
anyone entirely faulted
or entirely praised.
यं चे विञ्ञू पसंसन्ति, अनुविच्च सुवे सुवे।
अच्छिद्दवुत्तिं [अच्छिन्नवुत्तिं (क॰)] मेधाविं, पञ्ञासीलसमाहितं॥
दिन अनुदिन देखने के बाद विज्ञ जन जिसकी प्रशंसा करते हैं, जिसकी वृत्ति (प्रकृति, स्वभाव) में कोई दोष नहीं है, जो मेधावी है, जो प्रज्ञा और शील से संयुक्त है,
If knowledgeable people praise him,
having observed him
day after day
to be blameless in conduct, intelligent,
endowed with discernment & virtue:
निक्खं [नेक्खं (सी॰ स्या॰ पी॰)] जम्बोनदस्सेव, को तं निन्दितुमरहति।
देवापि नं पसंसन्ति, ब्रह्मुनापि पसंसितो॥
सोने की अशर्फ़ी के समान उसकी कौन निन्दा करेगा? देवता और ब्रह्मा भी उसकी बड़ाई करते हैं।
like an ingot of gold —
who's fit to find fault with him?
Even devas praise him.
Even by Brahmas he's praised.
कायप्पकोपं रक्खेय्य, कायेन संवुतो सिया।
कायदुच्चरितं हित्वा, कायेन सुचरितं चरे॥
देह को क्षोभ से बचाओ, देह से संयत रहो, देह से किये जानेवाले दुराचार को छोड़कर देह से सदाचार करो।
Guard against anger
erupting in body;
in body, be restrained.
Having abandoned bodily misconduct,
live conducting yourself well
in body.
वचीपकोपं रक्खेय्य, वाचाय संवुतो सिया।
वचीदुच्चरितं हित्वा, वाचाय सुचरितं चरे॥
वाणी को क्षोभ/ क्रोध से बचाओ, वाणी से संयत रहो, वाणी से किये जाने वाले दुराचार को छोड़कर वाणी से सदाचार करो।
Guard against anger
erupting in speech;
in speech, be restrained.
Having abandoned verbal misconduct,
live conducting yourself well
in speech.
मनोपकोपं रक्खेय्य, मनसा संवुतो सिया।
मनोदुच्चरितं हित्वा, मनसा सुचरितं चरे॥
मन को क्षोभ/ क्रोध से बचाओ, मन में संयत रहो, मन से दुराचरण छोड़कर मन से सदाचार करो ।
Guard against anger
erupting in mind;
in mind, be restrained.
Having abandoned mental misconduct,
live conducting yourself well
in mind.
कायेन संवुता धीरा, अथो वाचाय संवुता।
मनसा संवुता धीरा, ते वे सुपरिसंवुता॥
जो धीर पुरुष देह, वाणी और मन से संयत हैं, वे ही पूर्ण रूप से संयमी हैं।
Those restrained in body
— the enlightened —
restrained in speech & in mind
— enlightened —
are the ones whose restraint is secure.
कोधवग्गो सत्तरसमो निट्ठितो।
Kodhavagga: Anger" (Dhp XVII), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.17.than.html .
हिन्दी अनुवाद: राजीव
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