मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्कंव वहतो पदं॥
सभी क्रियाओं में मन पूर्वगामी है, मन की प्रधानता है। सभी क्रियाएँ मनोमय हैं। इसलिए जो प्रदूषित मन से बोलता या करता है, उसके पीछे दु:ख उसी प्रकार आता है, जैसे बैल के पैरों के पीछे पहिया।
Phenomena are preceded by the heart,
ruled by the heart,
made of the heart.
If you speak or act
with a corrupted heart,
then suffering follows you —
as the wheel of the cart,
the track of the ox
that pulls it.
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (क॰)]॥
सभी क्रियाओं में मन पूर्वगामी है, मन की प्रधानता है। सभी क्रियाएँ मनोमय हैं।इसलिए जो प्रसन्न मन से बोलता या करता है, उसके पीछे सुख उसी प्रकार आता है, जैसे कभी भी साथ न छोड़ने वाली छाया।
Phenomena are preceded by the heart,
ruled by the heart,
made of the heart.
If you speak or act
with a calm, bright heart,
then happiness follows you,
like a shadow
that never leaves.
ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥
उसने मेरा अपमान किया , मुझे मारा, मुझे हराया, मुझे लूटा- ऐसा जो बार-बार सोचते हैं, उनका वैर शान्त नहीं होता।
'He insulted me,
hit me,
beat me,
robbed me'
— for those who brood on this,
hostility isn't stilled.
अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।
ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥
उसने मेरा अपमान किया , मुझे मारा, मुझे हराया, मुझे लूटा- ऐसा जो बार-बार नहीं सोचते, उनका वैर शान्त होता है।
'He insulted me,
hit me,
beat me,
robbed me' —
for those who don't brood on this,
hostility is stilled.
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
यहाँ वैर से वैर कभी भी शान्त नहीं होता, अवैर से शान्त होता है- यही शाश्वत धर्म है।
Hostilities aren't stilled
through hostility,
regardless.
Hostilities are stilled
through non-hostility:
this, an unending truth.
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥
वे यह नहीं जानते कि हम यहाँ मृत्यु के कितने निकट हैं। जो जानते हैं उनके सारे झगड़े शान्त हो जाते हैं।
Unlike those who don't realize
that we're here on the verge
of perishing,
those who do:
their quarrels are stilled.
वे यह नहीं जानते कि हम यहाँ मृत्यु के कितने निकट हैं। जो जानते हैं उनके सारे झगड़े शान्त हो जाते हैं।
सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं।
भोजनम्हि चामत्तञ्ञुं, कुसीतं हीनवीरियं।
तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खंव दुब्बलं॥
जो इन्द्रिय सुख को शुभ समझकर इन्द्रियों का संयम नहीं करता, भोजन में मात्रा का ध्यान नहीं रखता, जो उदासीन और निरुत्साही है- उसे मार उसी प्रकार विनष्ट करता है जैसे एक दुर्बल वृक्ष को हवा।
One who stays focused on the beautiful,
is unrestrained with the senses,
knowing no moderation in food,
apathetic, unenergetic:
Mara overcomes him
as the wind, a weak tree.
जो इन्द्रिय सुख को शुभ समझकर इन्द्रियों का संयम नहीं करता, भोजन में मात्रा का ध्यान नहीं रखता, जो उदासीन और निरुत्साही है- उसे मार उसी प्रकार विनष्ट करता है जैसे एक दुर्बल वृक्ष को हवा।
असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलंव पब्बतं॥
जो इन्द्रिय सुख को अशुभ समझकर इन्द्रियों का संयम करता है, भोजन में मात्रा का ध्यान रखता है, जो श्रद्धावान और उत्साही है- उसे मार विनष्ट नहीं कर सकता जैसे हवा चट्टानों वाले पहाड़ को नहीं उखाड़ सकती।One who stays focused on the foul, is restrained with regard to the senses, knowing moderation in food, full of conviction & energy: Mara does not overcome him as the wind, a mountain of rock.
अनिक्कसावो कासावं, यो वत्थं परिदहिस्सति।
अपेतो दमसच्चेन, न सो कासावमरहति॥
जो संयम और सत्य से रहित हैं, जो विकार ग्रस्त हैं, वे काषाय वस्त्र धारण करते हैं तो वे उस वस्त्र के पात्र नहीं हैं।
He who, depraved,
devoid
of truthfulness
& self-control,
puts on the ochre robe,
doesn't deserve the ochre robe.
जो संयम और सत्य से रहित हैं, जो विकार ग्रस्त हैं, वे काषाय वस्त्र धारण करते हैं तो वे उस वस्त्र के पात्र नहीं हैं।
यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो।
उपेतो दमसच्चेन, स वे कासावमरहति॥
जो संयम और सत्य से पूर्ण हैं, जिनका शील सुदृढ़ है - वे उस वस्त्र के पात्र हैं।But he who is free of depravity endowed with truthfulness & self-control, well-established in the precepts, truly deserves the ochre robe.
असारे सारमतिनो, सारे चासारदस्सिनो।
ते सारं नाधिगच्छन्ति, मिच्छासङ्कप्पगोचरा॥
जो असार को सार और सार को असार मानते हैं, वे मिथ्या संकल्पों में उलझकर सार प्राप्त नहीं करते।
Those who regard
non-essence as essence
and see essence as non-,
don't get to the essence,
ranging about in wrong resolves.
जो असार को सार और सार को असार मानते हैं, वे मिथ्या संकल्पों में उलझकर सार प्राप्त नहीं करते।
ते सारं अधिगच्छन्ति, सम्मासङ्कप्पगोचरा॥
जो सार को सार और असार को असार मानते हैं, वे सम्यक संकल्पों के साथ सार प्राप्त करते हैं।
यथा अगारं दुच्छन्नं, वुट्ठी समतिविज्झति।
एवं अभावितं चित्तं, रागो समतिविज्झति॥
जैसे जिस घर का छप्पर ठीक से छाया न गया हो तो उसमें बरसात का पानी भीतर चला जाता है, इसी प्रकार अभावित चित्त ( अविकसित चित्त अर्थात् जिसने भावना या ध्यान का अभ्यास कर अपने चित्त के दोषों को दूर नहीं किया है) में राग प्रवेश करता है।
As rain seeps into
an ill-thatched hut,
so passion,
the undeveloped mind.
जैसे जिस घर का छप्पर ठीक से छाया न गया हो तो उसमें बरसात का पानी भीतर चला जाता है, इसी प्रकार अभावित चित्त ( अविकसित चित्त अर्थात् जिसने भावना या ध्यान का अभ्यास कर अपने चित्त के दोषों को दूर नहीं किया है) में राग प्रवेश करता है।
एवं सुभावितं चित्तं, रागो न समतिविज्झति॥
जैसे जिस घर का छप्पर ठीक से छाया गया हो तो उसमें बरसात का पानी भीतर नहीं जाता है, इसी प्रकार सुभावित चित्त में राग प्रवेश नहीं करता है।
a well-thatched hut,
so passion does not,
the well-developed mind.
सो सोचति सो विहञ्ञति, दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो॥
इस लोक में शोक करता है, परलोक में शोक करता है, पापकर्म करने वाला दोनो लोकों में शोक करता है। अपने दूषित कर्म को देखकर वह व्यथित और व्यग्र होता है।
Here he grieves
he grieves hereafter.
In both worlds
the wrong-doer grieves.
He grieves, he's afflicted,
seeing the corruption
of his deeds.
इस लोक में शोक करता है, परलोक में शोक करता है, पापकर्म करने वाला दोनो लोकों में शोक करता है। अपने दूषित कर्म को देखकर वह व्यथित और व्यग्र होता है।
इध मोदति पेच्च मोदति, कतपुञ्ञो उभयत्थ मोदति।
सो मोदति सो पमोदति, दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो॥
इस लोक में प्रसन्न होता है, परलोक में प्रसन्न होता है, पुण्कयर्म करने वाला दोनो लोकों में प्रसन्न होता है। अपने विशुद्ध कर्म को देखकर वह आनन्दित और प्रमुदित होता है।
Here he rejoices
he rejoices hereafter.
In both worlds
the merit-maker rejoices.
He rejoices, is jubilant,
seeing the purity
of his deeds.
इध तप्पति पेच्च तप्पति, पापकारी [पापकारि (?)] उभयत्थ तप्पति।
‘‘पापं मे कत’’न्ति तप्पति, भिय्यो [भीयो (सी॰)] तप्पति दुग्गतिं गतो॥
इस लोक में पछताता है, परलोक में पछताता है, पापकर्म करने वाला दोनो लोकों में पछताता है। मैं ने पाप किया- यह सोचकर पछताता है , दुर्गति प्रप्त कर अत्यधिक पछताता है।
he's tormented hereafter.
In both worlds
the wrong-doer's tormented.
He's tormented at the thought,
'I've done wrong.'
Having gone to a bad destination,
he's tormented
all the more.
Here he delights
he delights hereafter.
In both worlds
the merit-maker delights.
He delights at the thought,
'I've made merit.'
Having gone to a good destination,
he delights
all the more.
If he recites next to nothing
but follows the Dhamma
in line with the Dhamma;
abandoning passion,
aversion, delusion;
alert,
his mind well-released,
not clinging
either here or hereafter:
he has his share in the contemplative life.
यमकवग्गो पठमो निट्ठितो।
"Yamakavagga: Pairs" (Dhp I), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.01.than.html . Retrieved on 26 November 2012.
इध नन्दति पेच्च नन्दति, कतपुञ्ञो उभयत्थ नन्दति।
‘‘पुञ्ञं मे कत’’न्ति नन्दति, भिय्यो नन्दति सुग्गतिं गतो॥
इस लोक में आनन्दित होता है, परलोक में आनन्दित होता है, पुण्कयर्म करने वाला दोनो लोकों में आनन्दित होता है। मैं ने पुण्य किया- यह सोचकर आनन्दित होता है , सद्गति प्रप्त कर अत्यधिक आनन्दित होता है।
बहुम्पि चे संहित [सहितं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो।
If he recites many teachings, but
— heedless man —
doesn't do what they say,
like a cowherd counting the cattle of
others,
he has no share in the contemplative life.
अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति [होती (सी॰ पी॰)] अनुधम्मचारी।
रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं, सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।
अनुपादियानो इध वा हुरं वा, स भागवा सामञ्ञस्स होति॥
वह किसी संहिता का पाठ नहीं करता है , लेकिन धर्म के अनुसार आचरण करता है, तो राग दोष और मोह छोड़कर सम्यक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न विमुक्त चित्त वाला व्यक्ति यहाँ या वहाँ कहीं भी न चिपकते हुए श्रमण की साधना के योग्य है।यमकवग्गो पठमो निट्ठितो।
हिन्दी अनुवाद: राजीव
अद्भुत अनुस्मारक!
ReplyDeleteप्रेरक,उत्साहवर्द्धक और मार्गदर्शी सूक्तियाँ
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