Tuesday, January 1, 2013

बालवग्गो



६०.
दीघा जागरतो रत्ति, दीघं सन्तस्स योजनं।
दीघो बालानं संसारो, सद्धम्मं अविजानतं॥

जगे हुए के लिए रात लम्बी है, थके हुए के लिए योजन लम्बा है, जो सद्धर्म नहीं जानते उनके लिए संसार लम्बा है।
Long for the wakeful is the night. Long for the weary, a league. For fools unaware of True Dhamma, samsara is long.
६१.
चरञ्‍चे नाधिगच्छेय्य, सेय्यं सदिसमत्तनो।
एकचरियं [एकचरियं (क॰)] दळ्हं कयिरा, नत्थि बाले सहायता॥

इस जीवन यात्रा के दौरान तुमसे श्रेष्ठ या तुम्हारे समान संगी न मिले तो दृढ़ निश्चय  होकर अकेले चलो। मूर्खों का साथ ठीक नहीं।
If, in your course, you don't meet your equal, your better, then continue your course, firmly, alone. There's no fellowship with fools.
६२.
पुत्ता मत्थि धनम्मत्थि [पुत्तमत्थि धनमत्थि (क॰)], इति बालो विहञ्‍ञति।
अत्ता हि [अत्तापि (?)] अत्तनो नत्थि, कुतो पुत्ता कुतो धनं॥

मूर्ख सोचता है -यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है। जब उसका अपना आत्म (स्व) ही अपना नहीं है, तो कहां पुत्र और कहां धन! 

'I have sons, I have wealth' — the fool torments himself. When even he himself doesn't belong to himself, how then sons? How wealth?
६३.
यो बालो मञ्‍ञति बाल्यं, पण्डितो वापि तेन सो।
बालो च पण्डितमानी, स वे ‘‘बालो’’ति वुच्‍चति॥

जो मूर्ख अपनी मूर्खता जानता है, वह अपने इस ज्ञान के कारण पण्डित है। जो मूर्ख अपने आपको पण्डित मानता है, उसे ही मूर्ख कहा जाता है।
A fool with a sense of his foolishness is — at least to that extent — wise. But a fool who thinks himself wise really deserves to be called a fool.
६४.
यावजीवम्पि चे बालो, पण्डितं पयिरुपासति।
न सो धम्मं विजानाति, दब्बी सूपरसं यथा॥

आजीवन पण्डित के पास रहने पर भी मूर्ख धर्म नहीं जानता, जैसे चमचे को सूप का स्वाद मालूम नहीं होता।
Even if for a lifetime the fool stays with the wise, he knows nothing of the Dhamma — as the ladle, the taste of the soup.
६५.
मुहुत्तमपि चे विञ्‍ञू, पण्डितं पयिरुपासति।
खिप्पं धम्मं विजानाति, जिव्हा सूपरसं यथा॥

बुद्धिमान व्यक्ति मुहूर्त भर भी पण्डित के पास रहे तो वह तुरंत धर्म जानता है, जैसे जीभ पल भर में सूप का स्वाद समझती है।
Even if for a moment, the perceptive person stays with the wise, he immediately knows the Dhamma — as the tongue, the taste of the soup.
६६.
चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमित्तेनेव अत्तना।
करोन्ता पापकं कम्मं, यं होति कटुकप्फलं॥

मूर्ख, बुद्धिहीन लोग स्वयं अपने दुश्मन हैं। वे पापकर्म करते हुए जीते हैं, जिनका फल कटु होता है।
Fools, their wisdom weak, are their own enemies as they go through life, doing evil that bears bitter fruit.
६७.
न तं कम्मं कतं साधु, यं कत्वा अनुतप्पति।
यस्स अस्सुमुखो रोदं, विपाकं पटिसेवति॥

उस कर्म को करना अच्छा नहीं है, जिसे करके आदमी पछताता है, जिसके फल का सेवन  आदमी अश्रुमुख होकर रोते हुए करता है।
It's not good, the doing of the deed that, once it's done, you regret, whose result you reap crying, your face in tears.

६८.
तञ्‍च कम्मं कतं साधु, यं कत्वा नानुतप्पति।
यस्स पतीतो सुमनो, विपाकं पटिसेवति॥

उस कर्म को करना अच्छा  है, जिसे करके आदमी पछताता नहीं है, जिसके फल का सेवन आदमी अच्छे मन से करता है।
It's good, the doing of the deed that, once it's done, you don't regret, whose result you reap gratified, happy at heart.
६९.
मधुवा [मधुं वा (दी॰ नि॰ टीका १)] मञ्‍ञति बालो, याव पापं न पच्‍चति।
यदा च पच्‍चति पापं, बालो [अथ बालो (सी॰ स्या॰) अथ (?)] दुक्खं निगच्छति॥

जब तक पाप का फल नहीं मिलता तबतक मूर्ख उसे मधु समझता है, जब पाप का फल मिलता है तो मूर्ख दुखी होता है।
As long as evil has yet to ripen, the fool mistakes it for honey. But when that evil ripens, the fool falls into pain.
७०.
मासे मासे कुसग्गेन, बालो भुञ्‍जेय्य भोजनं।
न सो सङ्खातधम्मानं [सङ्खतधम्मानं (सी॰ पी॰ क॰)], कलं अग्घति सोळसिं॥

महीनों तक कुशाग्र के बराबर भोजन करने पर भी मूर्ख किसी  धर्मज्ञ के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं माना जाएगा।
Month after month the fool might eat only a tip-of-grass measure of food, but he wouldn't be worth one sixteenth of those who've fathomed the Dhamma.
७१.
न हि पापं कतं कम्मं, सज्‍जु खीरंव मुच्‍चति।
डहन्तं बालमन्वेति, भस्मच्छन्‍नोव [भस्माछन्‍नोव (सी॰ पी॰ क॰)] पावको॥


जैसे दूध तुरंत दही नहीं बन जाता, वेसे ही पाप कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता है। भस्म में ढँके आग की तरह पापकर्म मूर्ख का पीछा करता है और उसे जलाता है। 
An evil deed, when done, doesn't — like ready milk — come out right away. It follows the fool, smoldering like a fire hidden in ashes.
७२.
यावदेव अनत्थाय, ञत्तं [ञातं (?)] बालस्स जायति।
हन्ति बालस्स सुक्‍कंसं, मुद्धमस्स विपातयं॥

मूर्ख द्वारा प्राप्त यश भी उसके अनर्थ के लिए होता है- वह उसकी बची हुई अच्छाई को नष्ट करता है।
Only for his ruin does renown come to the fool. It ravages his bright fortune & rips his head apart.
७३.
असन्तं भावनमिच्छेय्य [असन्तं भावमिच्छेय्य (स्या॰), असन्तभावनमिच्छेय्य (क॰)], पुरेक्खारञ्‍च भिक्खुसु।
आवासेसु च इस्सरियं, पूजा परकुलेसु च॥

वह ऐसी प्रतिष्ठा चाहता है, जिसका वह हकदार नहीं है। वह भिक्षुओं में सर्वोपरि स्थान , मठों में स्वामित्व और गृहस्थों में अपनी पूजा चाहता है।
He would want unwarranted status, preeminence among monks, authority among monasteries, homage from lay families.

७४.
ममेव कत मञ्‍ञन्तु, गिहीपब्बजिता उभो।
ममेवातिवसा अस्सु, किच्‍चाकिच्‍चेसु किस्मिचि।
इति बालस्स सङ्कप्पो, इच्छा मानो च वड्ढति॥

'गृही और परिव्राजक, दोनों यह समझें कि यह मेरे द्वारा ही सम्पन्न हुआ है। छोटे बड़े सभी कार्यों में मेरा ही अनुसरण हो।' यही मूर्ख का संकल्प रहता है और इस प्रकार उसकी इच्छा और अहंकार बढ़ता जाता है।
Let householders & those gone forth both think that this was done by me alone. May I alone determine what's a duty, what's not': the resolve of a fool as they grow — his desire & pride.
७५.
अञ्‍ञा हि लाभूपनिसा, अञ्‍ञा निब्बानगामिनी।
एवमेतं अभिञ्‍ञाय, भिक्खु बुद्धस्स सावको।
सक्‍कारं नाभिनन्देय्य, विवेकमनुब्रूहये॥

लाभ का रास्ता अलग है और निर्वाण का रास्ता अलग। इसे अच्छी तरह समझकर बुद्ध के शिष्य, भिक्खु को सत्कार का स्वागत नहीं करना चाहिए, विवेक (अनासक्ति, विराग) की खोज में लगे रहना चाहिए।
The path to material gain goes one way, the way to Unbinding, another. Realizing this, the monk, a disciple to the Awakened One, should not relish offerings, should cultivate seclusion instead.
बालवग्गो पञ्‍चमो निट्ठितो।

"Balavagga: Fools" (Dhp V), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी अनुवाद: राजीव

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