Wednesday, August 26, 2020

१६. पियवग्गो


२०९.

अयोगे युञ्‍जमत्तानं, योगस्मिञ्‍च अयोजयं।

अत्थं हित्वा पियग्गाही, पिहेतत्तानुयोगिनं॥

जो अयोग्य (अनुचित/त्याज्य कर्म) है, उसमें अपने आप को लगाना, और जो योग्य ( कर्तव्य कर्म) है, उससे अपने आप को दूर रखना, शुभ को छोड़कर प्रिय को अपनाना—— जो ऐसा करते हैं वे बाद में आत्मानुयोगी (आत्म कल्याण में लगे) जनों को देखकर ईर्ष्या करते हैं।

Having applied himself

to what was not his own task,

and not having applied himself

to what was,

having disregarded the goal

to grasp at what he held dear,

he now envies those

who kept after themselves,

            took themselves

                to task.

 

२१०.

मा पियेहि समागञ्छि, अप्पियेहि कुदाचनं।

पियानं अदस्सनं दुक्खं, अप्पियानञ्‍च दस्सनं॥

प्रिय की संगति न करो और अप्रिय की भी कभी नहीं। प्रिय के न मिलने से दुख होता है, अप्रिय के मिलने से दुख होता है।

Don't ever — regardless —

be conjoined with what's dear

         or undear.

It's painful

not to see what's dear

or to see what's not.

 

२११.

तस्मा पियं न कयिराथ, पियापायो हि पापको।

गन्था तेसं न विज्‍जन्ति, येसं नत्थि पियाप्पियं॥

इसलिए किसी को प्रिय न बनाओ। प्रिय का नाश बुरा लगता है। जिनका कोई प्रिय-अप्रिय नहीं है , उनके लिए कोई बन्धन नहीं है ।

So don't make anything dear,

for it's dreadful to be far

from what's dear.

No bonds are found

for those for whom

there's neither dear

nor undear.

 

२१२.

पियतो जायती सोको, पियतो जायती [जायते (क॰)] भयं।

पियतो विप्पमुत्तस्स, नत्थि सोको कुतो भयं॥

प्रिय के कारण शोक उत्पन्न होता है, प्रिय के कारण भय उत्पन्न होता है। प्रिय के बन्धन से मुक्त जनों को कोई शोक या भय नहीं होता ।

From what's dear is born grief,

from what's dear is born fear.

For one freed from what's dear

there's no grief

         — so how fear?

 

२१३.

पेमतो जायती सोको, पेमतो जायती भयं।

पेमतो विप्पमुत्तस्स, नत्थि सोको कुतो भयं॥

प्रेम से ही शोक और भय उत्पन्न होता है । प्रेम से विमुक्त जन को शोक और भय नहीं होता।

From what's loved is born grief,

from what's loved is born fear.

For one freed from what's loved

there's no grief

         — so how fear?

 

२१४.

रतिया जायती सोको, रतिया जायती भयं।

रतिया विप्पमुत्तस्स, नत्थि सोको कुतो भयं॥

रति से ही.......

From delight is born grief,

from delight is born fear.

For one freed from delight

there's no grief

         — so how fear?

 

 

२१५.

कामतो जायती सोको, कामतो जायती भयं।

कामतो विप्पमुत्तस्स, नत्थि सोको कुतो भयं॥

 

काम से ही.......

 

 

From sensuality is born grief,

from sensuality is born fear.

For one freed from sensuality

there's no grief

         — so how fear?

 

२१६.

तण्हाय जायती [जायते (क॰)] सोको, तण्हाय जायती भयं।

तण्हाय विप्पमुत्तस्स, नत्थि सोको कुतो भयं॥

तृष्णा से ही..

 

 

From craving is born grief,

from craving is born fear.

For one freed from craving

there's no grief

         — so how fear?

 

२१७.

सीलदस्सनसम्पन्‍नं , धम्मट्ठं सच्‍चवेदिनं।

अत्तनो कम्म कुब्बानं, तं जनो कुरुते पियं॥

 

शील (सद्गुण) और दर्शन (सुदृष्टि) से सम्पन्न , धर्म में स्थित, सत्यवादी, अपना कर्तव्य करने वाले व्यक्ति को लोग प्रिय मानते हैं।

One consummate in virtue & vision,

judicious,

speaking the truth,

doing his own task:

         the world holds him dear.

 

 

२१८.

छन्दजातो अनक्खाते, मनसा च फुटो सिया।

कामेसु च अप्पटिबद्धचित्तो [अप्पटिबन्धचित्तो (क॰)], उद्धंसोतोति वुच्‍चति॥

जो अवर्णनीय स्थिति (निर्वाण) प्राप्त करने की अभिलाषा रखता है, जिसका मन उसी ओर स्फूर्ति के साथ लगा हुआ है, जिसका मन काम (इन्द्रिय सुख) से बँधा हुआ नहीं है, ऐसे व्यक्ति को ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्वमुखी) कहते हैं ।

         If

you've given birth to a wish

         for what can't be expressed,

are suffused with heart,

your mind not enmeshed

in sensual passions:

         you're said to be

         in the up-flowing stream.

 

२१९.

चिरप्पवासिं पुरिसं, दूरतो सोत्थिमागतं।

ञातिमित्ता सुहज्‍जा च, अभिनन्दन्ति आगतं॥

बहुत दिनों से परदेस में प्रवास करने वाला व्यक्ति जब लम्बी दूरी तय कर सकुशल घर लौटता है, तो उसके बन्धु-बान्धव, मित्र और सुहृद उसका अभिनन्दन करते हैं।

 



A man long absent

comes home safe from afar.

His kin, his friends, his companions,

delight in his return

 

२२०.

तथेव कतपुञ्‍ञम्पि, अस्मा लोका परं गतं।

पुञ्‍ञानि पटिगण्हन्ति, पियं ञातीव आगतं॥

इसी प्रकार पुण्य कर्म करनेवाला जब इस लोक से परलोक जाता है तो उसके पुण्य कर्म बन्धु-बान्धवों की तरह उसका स्वागत करते हैं ।

 

In just the same way,

when you've done good

& gone from this world

         to the world beyond,

your good deeds receive you —

as kin, someone dear

         come home.

 



पियवग्गो सोळसमो निट्ठितो।

 

Piyavagga: Dear Ones" (Dhp XVI), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.16.than.html .

 

हिन्दी अनुवाद: राजीव 

 

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