Friday, August 21, 2020

१४. बुद्धवग्गो


१७९.

यस्स जितं नावजीयति, जितं यस्स [जितमस्स (सी॰ स्या॰ पी॰), जितं मस्स (क॰)] नो याति कोचि लोके।

तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ॥

जिसकी जय को पराजय में नहीं बदला जा सकता, जिसके द्वारा जीते गये (राग,द्वेष,मोह) फिर वापस नहीं लौटते, उस अनन्तद्रष्टा बुद्ध को, उस अपद (ऐसी स्थिति जिसका कोई बाह्य संकेत/लक्षण नहीं है) को किस पथ से प्राप्त करोगे।

Whose conquest can't be undone,

whose conquest no one in the world

         can reach;

awakened, his pasture endless,

         pathless:

by what path will you lead him astray?

 

१८०.

यस्स जालिनी विसत्तिका, तण्हा नत्थि कुहिञ्‍चि नेतवे।

तं बुद्धमनन्तगोचरं, अपदं केन पदेन नेस्सथ॥

जिसमें जाल फैलानेवाली विषरूपी तृष्णा नहीं बची है, जो उसे कहीं भी ले जाए। ऐसे अनन्तद्रष्टा अपद बुद्ध को किस पथ से पाओगे।

In whom there's no craving

 — the sticky ensnarer —

to lead him anywherever at all;

awakened, his pasture endless,

         pathless:

by what path will you lead him astray?

 

 

१८१.

ये झानपसुता धीरा, नेक्खम्मूपसमे रता।

देवापि तेसं पिहयन्ति, सम्बुद्धानं सतीमतं॥

जो धीर पुरुष ध्यान, निष्कर्म और उपशम (मनोविकारों की शान्ति) में लगे रहते हैं, ऐसे स्मृतिवान सम्बुद्ध से देवता भी ईर्ष्या करते हैं।



They, the enlightened, intent on jhana,

delighting in stilling

& renunciation,

self-awakened & mindful:

         even the devas

         view them with envy.

 

 

१८२.

किच्छो मनुस्सपटिलाभो, किच्छं मच्‍चान जीवितं।

किच्छं सद्धम्मस्सवनं, किच्छो बुद्धानमुप्पादो॥

 

मनुष्य के रूप में जन्म पाना कठिन है, मरणशील का जीवन कठिन है, अच्छे धर्म का श्रवण कठिन है, बुद्धों का अवतरण कठिन है।

Hard    the winning of a human birth.

Hard    the life of mortals.

Hard    the chance to hear the true Dhamma.

Hard    the arising of Awakened Ones.

 

१८३.

सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा [कुसलस्सूपसम्पदा (स्या॰)]

सचित्तपरियोदपनं [सचित्तपरियोदापनं (?)], एतं बुद्धान सासनं॥

कोई पाप न करें, कुशल/अच्छा कर्म करें, अपने चित्त को निर्मल रखें—-बुद्ध की यही शिक्षा है।

The non-doing   of any evil,

the performance     of what's skillful,

the cleansing   of one's own mind:

         this is the teaching

         of the Awakened.

 

१८४.

खन्ती परमं तपो तितिक्खा, निब्बानं [निब्बाणं (क॰ सी॰ पी॰)] परमं वदन्ति बुद्धा।

न हि पब्बजितो परूपघाती, न [अयं नकारो सी॰ स्या॰ पी॰ पात्थकेसु न दिस्सति] समणो होति परं विहेठयन्तो॥

बुद्ध कहते हैं कि क्षमा और सहनशीलता (कष्ट सहने की क्षमता) परम तप हैं, निर्वाण परम पद है, दूसरे को हानि पहुँचाने वाला, दूसरे को कष्ट देनेवाला संन्यासी या श्रमण नहीं है ।

Patient endurance:

         the foremost austerity.

Unbinding:

         the foremost,

         so say the Awakened.

He who injures another

is no contemplative.

He who mistreats another,

         no monk.

 

१८५.

अनूपवादो अनूपघातो [अनुपवादो अनुपघातो (स्या॰ क॰)], पातिमोक्खे च संवरो।

मत्तञ्‍ञुता च भत्तस्मिं, पन्तञ्‍च सयनासनं।

अधिचित्ते च आयोगो, एतं बुद्धान सासनं॥

निन्दा न करना, प्रहार न करना, पातिमोक्ख (प्रतिमोक्ष= भिक्षुओं के आचार-नियम) के अनुसार व्यवहार करना, भोजन में मात्रा जानना, एकान्त में सोना-बैठना, चित्त की उच्चतर स्थिति के लिए प्रयास करना-  यह बुद्ध की शिक्षा है ।

Not disparaging, not injuring,

restraint   in line with the Patimokkha,

moderation  in food,

dwelling        in seclusion,

commitment  to the heightened mind:

         this is the teaching

         of the Awakened.

 

१८६.

 कहापणवस्सेन, तित्ति कामेसु विज्‍जति।

अप्पस्सादा दुखा कामा, इति विञ्‍ञाय पण्डितो॥

 

सोने के मोहरों की वर्षा भी हो जाए तो काम-भोगों की तृप्ति नहीं होगी। काम-भोगों का अल्पस्वाद होता है (वे थोड़ी देर तक ही अच्छे लगते हैं ) और वे दुःख देते हैं। पण्डित यह जानकर—-

Not even if it rained gold coins

would we have our fill

of sensual pleasures.

         'Stressful,

         they give little enjoyment' —

 

 

१८७.

अपि दिब्बेसु कामेसु, रतिं सो नाधिगच्छति।

तण्हक्खयरतो होति, सम्मासम्बुद्धसावको॥

 

(पण्डित यह जानकर) स्वर्गिक सुखों के पीछे भी नहीं जाते। सम्यक सम्बुद्ध का शिष्य तृष्णा समाप्त करने में लगा रहता है।

knowing this, the wise one

         finds no delight

even in heavenly sensual pleasures.

He is one who delights

         in the ending of craving,

         a disciple of the Rightly

         Self-Awakened One.

 

१८८.

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च।

आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्‍जिता॥

लोग भयभीत होकर पर्वतों, वनों, उद्यानों, पेड़ों, चैत्यों आदि की शरण में जाते हैं ।

They go to many a refuge,

         to mountains and forests,

         to park and tree shrines:

people threatened with danger.

१८९.

नेतं खो सरणं खेमं, नेतं सरणमुत्तमं।

नेतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्‍चति॥

लेकिन ये सुरक्षित शरण-स्थल नहीं हैं, उत्तम शरण-स्थल नहीं हैं। इनकी शरण में जाने पर सभी दुखों से छुटकारा नहीं मिलता।

That's not the secure refuge,

         not the supreme refuge,

that's not the refuge,

having gone to which,

         you gain release

         from all suffering & stress.

 

 

 

१९०.

यो च बुद्धञ्‍च धम्मञ्‍च, सङ्घञ्‍च सरणं गतो।

चत्तारि अरियसच्‍चानि, सम्मप्पञ्‍ञाय पस्सति॥

 

जो बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाते हैं, वे अपने विवेक से चार आर्यसत्य देखते हैं ।


  But when, having gone

to the Buddha, Dhamma,

& Sangha for refuge,

you see with right discernment

the four noble truths —

                  

 

१९१.

दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्‍कमं।

अरियं चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं॥

दुख, दुख का कारण, दुख का अतिक्रमण और दुख के उपशमन के लिए श्रेष्ठ अष्टांगिक मार्ग ( ये चार आर्यसत्य हैं।)

          stress,

                the cause of stress,

         the transcending of stress,

& the noble eightfold path,

         the way to the stilling of stress:

 

१९२.

एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं।

एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्‍चति॥

यही सुरक्षित शरण है, यही उत्तम शरण है, इनकी शरण में आकर ही सभी दुखों से छुटकारा मिलता है ।

that's the secure refuge,

that, the supreme refuge,

that is the refuge,

having gone to which,

         you gain release

         from all suffering & stress.

 

१९३.

दुल्‍लभो पुरिसाजञ्‍ञो, न सो सब्बत्थ जायति।

यत्थ सो जायति धीरो, तं कुलं सुखमेधति॥

श्रेष्ठ पुरुष का जन्म दुर्लभ है, ऐसे पुरुष सर्वत्र जन्म नहीं लेते। जहाँ ऐसे धीर पुरुष जन्म लेते हैं, उस कुल में सुख की वृद्धि होती है।

It's hard to come by

         a thoroughbred of a man.

It's simply not true

         that he's born everywhere.

Wherever he's born, an enlightened one,

the family prospers,

            is happy.

 

 

१९४.

सुखो बुद्धानमुप्पादो, सुखा सद्धम्मदेसना।

सुखा सङ्घस्स सामग्गी, समग्गानं तपो सुखो॥

बुद्ध का आगमन सुख है, सद्धर्म की शिक्षा सुख है, संघ की एकता सुख है, एकत्रित होकर तप करना सुख है।

A blessing:     the arising of Awakened Ones.

A blessing:     the teaching of true Dhamma.

A blessing:     the concord of the Sangha.

The austerity of those in concord

            is a blessing.

 

१९५.

पूजारहे पूजयतो, बुद्धे यदि व सावके।

पपञ्‍चसमतिक्‍कन्ते, तिण्णसोकपरिद्दवे॥

 

बुद्ध और उनके शिष्य, जिन्होंने सारे प्रपंच समाप्त कर लिए हैं, जो शोक और भय को पार कर गये हैं, वे ही पूजा के योग्य हैं और उनकी पूजा की जानी चाहिए।

If you worship those worthy of worship,

 — Awakened Ones or their disciples —

who've transcended

         objectifications,

         lamentation,

         & grief,

 

१९६.

ते तादिसे पूजयतो, निब्बुते अकुतोभये।

न सक्‍का पुञ्‍ञं सङ्खातुं, इमेत्तमपि केनचि॥

जो उनकी और उन जैसे निर्वाणप्राप्त, अकुतोभय (जिन्हें किसी से डर नहीं लगता) जनों की पूजा करते हैं, उनके पुण्य का परिमाण आँका नहीं जा सकता।

who are unendangered,

         fearless,

         unbound:

there's no measure for reckoning

that your merit's 'this much.'

 

बुद्धवग्गो चुद्दसमो निट्ठितो।

English translation:"Buddhavagga: Awakened" (Dhp XIV), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.14.than.html .

 

हिन्दी अनुवाद: राजीव 

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