१४६.
को नु हासो [किन्नु हासो (क॰)] किमानन्दो, निच्चं पज्जलिते सति।
अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ॥
कैसी हँसी, कैसा आनन्द, जब नित्य (निरन्तर) आग लगी है। अन्धकार से घिरे होकर भी क्या दीपक नहीं ढूँढ़ोगे?
What laughter, why joy,
when constantly aflame?
Enveloped in darkness,
don't you look for a lamp?
१४७.
पस्स चित्तकतं बिम्बं, अरुकायं समुस्सितं।
आतुरं बहुसङ्कप्पं, यस्स नत्थि धुवं ठिति॥
इस विचित्र शरीर को देखो, जो ज़ख़्मों से भरा हुआ है और सूजा हुआ है। इसके बावजूद यह आतुर है और अनेक संकल्पों से भरा हुआ है। इस शरीर की कोई स्थिति टिकाऊ नहीं है।
Look at the beautified image,
a heap of festering wounds, shored up:
ill, but the object
of many resolves,
where। there is nothing
lasting or sure.
१४८.
परिजिण्णमिदं रूपं, रोगनीळं [रोगनिड्ढं (सी॰ पी॰), रोगनिद्धं (स्या॰)] पभङ्गुरं।
भिज्जति पूतिसन्देहो, मरणन्तञ्हि जीवितं॥
यह रूप पूरी तरह से जीर्ण हो चुका है, यह देह रोगों का घर है, यह भंगुर (नाशवान) है, यह सड़-गल कर नष्ट हो जाएगी, क्योंकि जीवितों का अन्त मृत्यु ही है।
Worn out is this body,
a nest of diseases, dissolving.
This putrid conglomeration
is bound to break up,
for life is hemmed in with death.
१४९.
यानिमानि अपत्थानि [यानिमानि अपत्थानि (सी॰ स्या॰ पी॰), यानिमानि’पविद्धानि (?)], अलाबूनेव [अलापूनेव (सी॰ स्या॰ पी॰)] सारदे।
कापोतकानि अट्ठीनि, तानि दिस्वान का रति॥
जाड़े की अपथ्य लौकी की भाँति (जिसे फेंक दिया जाता है), कबूतरों की हड्डियों की तरह सफ़ेद हो गये इस शरीर को देख कर किसे ख़ुशी मिलेगी?
On seeing these bones
discarded
like gourds in the fall,
pigeon-gray:
what delight?
१५०.
अट्ठीनं नगरं कतं, मंसलोहितलेपनं।
यत्थ जरा च मच्चु च, मानो मक्खो च ओहितो॥
यह नगर हड्डियों से बना है और इसकी दीवार मांस और लहू से लेपी गयी है और इसके भीतर जरा (बुढ़ापा), मृत्यु, अभिमान और ईर्ष्या का निवास है।
A city made of bones,
plastered over with flesh & blood,
whose hidden treasures are:
pride & contempt,
aging & death.
१५१.
जीरन्ति वे राजरथा सुचित्ता, अथो सरीरम्पि जरं उपेति।
सतञ्च धम्मो न जरं उपेति, सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति॥
सुचित्रित (सुन्दर) राजरथ भी जीर्ण हो जाते हैं, उसी प्रकार यह शरीर भी बूढ़ा हो जाता है। लेकिन, सज्जनों का धर्म (सद्गुण) जीर्ण नहीं होता, ऐसा सत्पुरुषों ने कहा है।
Even royal chariots
well-embellished
get run down,
and so does the body
succumb to old age.
But the Dhamma of the good
doesn't succumb to old age:
the good let the civilized know.
१५२.
अप्पस्सुतायं पुरिसो, बलिबद्धोव [बलिवद्दोव (सी॰ स्या॰ पी॰)] जीरति।
मंसानि तस्स वड्ढन्ति, पञ्ञा तस्स न वड्ढति॥
अल्पश्रुत ( अल्पज्ञानी ) पुरुष बैल की तरह बढ़ता है। उसका मांस बढ़ता है, प्रज्ञा (बुद्धि) नहीं।
This unlistening man
matures like an ox.
His muscles develop,
his discernment not.
१५३.
अनेकजातिसंसारं , सन्धाविस्सं अनिब्बिसं।
गहकारं [गहकारकं (सी॰ स्या॰ पी॰)] गवेसन्तो, दुक्खा जाति पुनप्पुनं॥
इस संसार में अनेक बार जन्म लेकर, बार-बार कष्ट भोगकर, बिना रुके दिन-रात गृह-निर्माता (इस देह को बनाने वाले) की खोज करता रहा हूँ।
Through the round of many births I roamed
without reward,
without rest,
seeking the house-builder.
Painful is birth
again & again.
१५४.
गहकारक दिट्ठोसि, पुन गेहं न काहसि।
सब्बा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङ्खतं।
विसङ्खारगतं चित्तं, तण्हानं खयमज्झगा॥
अरे गृह-निर्माता तुम दिख गये हो, अब तुम घर नहीं बना सकोगे। तुम्हारे घर के सभी बाँस टूट गये हैं और छप्पर बिखर गया है। संस्कारमुक्त चित्त से तृष्णा का क्षय हो गया है।
House-builder, you're seen!
You will not build a house again.
All your rafters broken,
the ridge pole dismantled,
immersed in dismantling, the mind
has attained to the end of craving.
१५५.
अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं।
जिण्णकोञ्चाव झायन्ति, खीणमच्छेव पल्लले॥
जिन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया, न युवावस्था में धन कमाया, वे कम मछलियों वाले तालाब के किनारे बैठे बूढ़े क्रौंच पक्षी की तरह चिन्ताग्रस्त दिखते हैं।
Neither living the chaste life
nor gaining wealth in their youth,
they waste away like old herons
in a dried-up lake
depleted of fish.
१५६.
अचरित्वा ब्रह्मचरियं, अलद्धा योब्बने धनं।
सेन्ति चापातिखीणाव, पुराणानि अनुत्थुनं॥
जिन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया, न युवावस्था में धन कमाया , वे बीती बातों को दोहराते हुए पुराने धनुष के समान पड़े रहते हैं।
Neither living the chaste life
nor gaining wealth in their youth,
they lie around,
misfired from the bow,
sighing over old times.
"Jaravagga: Aging" (Dhp XI), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.11.than.html .
हिन्दी अनुवाद—- राजीव
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