१२९.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सभी दण्ड (डंडे ) से डरते हैं। सबको मृत्यु से भय लगता है। (अतः), अपने साथ तुलना करके, (सबको अपने जैसा समझकर), न किसी की हत्या करनी चाहिए, न किसी को हत्या करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
All
tremble at the rod,
all
are fearful of death.
Drawing the parallel to
yourself,
neither kill nor get others to kill.
१३०.
सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥
सब दण्ड (डंडे) से डरते हैं। सबको अपनी जान प्यारी है। (अतः), अपने साथ तुलना करके, (सबको अपने जैसा समझकर), न किसी की हत्या करनी चाहिए, न किसी को हत्या करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
All
tremble at the rod,
all
hold their life dear.
Drawing the parallel to
yourself,
neither kill nor get others to kill.
१३१.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं॥
अपना सुख चाहने वाला कोई व्यक्ति , (उसी के समान) सुख चाहने वाले अन्य प्राणियों को सताता है तो मरने के बाद उसे सुख नहीं मिलता है।
Whoever takes a rod
to harm living beings desiring ease,
when he himself is looking for ease,
will meet with no ease after death.
१३२.
सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं॥
अपना सुख चाहने वाला कोई व्यक्ति , (उसी के समान) सुख चाहने वाले अन्य प्राणियों को नहीं सताता है तो वह मरने के बाद भी सुख पाता है।
Whoever doesn't take a rod
to harm living beings desiring ease,
when he himself is looking for ease,
will meet with ease after death.
१३३.
मावोच फरुसं कञ्चि, वुत्ता पटिवदेय्यु तं [पटिवदेय्युं तं (क॰)]।
दुक्खा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्यु तं [फुसेय्युं तं (क॰)]॥
किसी से कटु वचन मत बोलो। बोलने पर तुम्हें भी कटु वचन सुनना होगा। वाद-विवाद से दुख होता है। तुम्हारे प्रति हिंसा भी हो सकती है।
Speak harshly to no one,
or the words will be thrown
right back at you.
Contentious talk is painful,
for you get struck by rods in return.
१३४.
सचे नेरेसि अत्तानं, कंसो उपहतो यथा।
एस पत्तोसि निब्बानं, सारम्भो ते न विज्जति॥
यदि तुम अपने आप को उस काँसे के बर्तन की तरह बना सको जिसपर प्रहार करने से कोई अनुगूँज नहीं होती, तो तुमने निर्वाण पा लिया, तुम्हारे लिए कोई वाद-विवाद नहीं रहा।
If, like a flattened metal pot
you don't resound,
you've attained an Unbinding;
in you there's found
no contention.
१३५.
यथा दण्डेन गोपालो, गावो पाजेति गोचरं।
एवं जरा च मच्चु च, आयुं पाजेन्ति पाणिनं॥
जैसे चरवाहे डंडे लेकर गायों को चारागाह की ओर हाँककर ले जाते हैं, वैसे ही बुढ़ापा और मृत्यु प्राणियों/जीवों की आयु हाँककर ले जाती है।
As a cowherd with a rod
drives cows to the field,
so ageing & death
drive the life
of living beings.
१३६.
अथ पापानि कम्मानि, करं बालो न बुज्झति।
सेहि कम्मेहि दुम्मेधो, अग्गिदड्ढोव तप्पति॥
पाप करते समय मूर्ख को कोई होश नहीं रहता, लेकिन वही कर्म उस दुर्मति को जलती आग की तरह तपाता है।
When doing evil deeds,
the fool is oblivious.
The dullard
is tormented
by his own deeds,
as if burned by a fire.
१३७.
यो दण्डेन अदण्डेसु, अप्पदुट्ठेसु दुस्सति।
दसन्नमञ्ञतरं ठानं, खिप्पमेव निगच्छति॥
१३८.
वेदनं फरुसं जानिं, सरीरस्स च भेदनं [सरीरस्स पभेदनं (स्या॰)]।
गरुकं वापि आबाधं, चित्तक्खेपञ्च [चित्तक्खेपं व (सी॰ स्या॰ पी॰)] पापुणे॥
१३९.
राजतो वा उपसग्गं [उपस्सग्गं (सी॰ पी॰)], अब्भक्खानञ्च [अब्भक्खानं व (सी॰ पी॰)] दारुणं।
परिक्खयञ्च [परिक्खयं व (सी॰ स्या॰ पी॰)] ञातीनं, भोगानञ्च [भोगानं व (सी॰ स्या॰ पी॰)] पभङ्गुरं [पभङ्गुनं (क॰)]॥
१४०.
अथ वास्स अगारानि, अग्गि डहति [डय्हति (क॰)] पावको।
कायस्स भेदा दुप्पञ्ञो, निरयं सोपपज्जति [सो उपपज्जति (सी॰ स्या॰)]॥
जो अदण्डनीय को , निर्दोष को सताता है, वह शीघ्र ही निम्न दस गतियों में से किसी एक गति को प्राप्त करता है:—
तीव्र वेदना, विनाश, अंग-भंग, महाव्याधि, पागलपन, राजा / शासन की ओर से कष्ट, अपयश, बन्धु-बांधवों की हानि, सम्पत्ति की हानि,
और गृहदाह। अपनी मृत्यु के बाद वह दुर्बुद्धि नरक जाता है।
Whoever, with a rod,
harasses an innocent man, unarmed,
quickly falls into any of ten things:
harsh pains, devastation, a broken body, grave illness,
mental derangement, trouble with the government,
violent slander, relatives lost, property dissolved and
houses burned down.
At the break-up of the body
this one with no discernment,
reappears in
hell.
१४१.
न नग्गचरिया न जटा न पङ्का, नानासका थण्डिलसायिका वा।
रजोजल्लं उक्कुटिकप्पधानं, सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकङ्खं॥
न नंगे घूमने से, न जटा बढ़ाने से, न कीचड़ में लोटने से, न भोजन छोड़ने से, न ज़मीन पर सोने से, न धूल मलने से, न उकड़ूँ बैठ कर सोने से किसी मरणशील मानव की शुद्धि होती है, यदि उसने अपनी कामनाओं पर विजय न पायी हो।
Neither nakedness nor matted hair
nor mud nor the refusal of food
nor sleeping on the bare ground
nor dust & dirt nor squatting austerities
cleanses the mortal
who's not gone beyond doubt.
१४२.
अलङ्कतो चेपि समं चरेय्य, सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।
सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खु॥
वस्त्र/आभूषण पहनने वाला व्यक्ति भी यदि सम (सबके प्रति समान, एक जैसा) आचरण करता है, सभी जीवों के प्रति हिंसा त्याग करता है, जो शान्त है, जिसकी इन्द्रियाँ दमित हैं, जो संयमित (आत्म-नियंत्रित) है, वही ब्राह्मण है, वही श्रमण है, वही भिक्षु है।
If, though adorned, one lives in tune
with the chaste life
— calmed, tamed, & assured —
having put down the rod toward all beings,
he's a contemplative
a brahman
a monk.
१४३.
हिरीनिसेधो पुरिसो, कोचि लोकस्मि विज्जति।
यो निद्दं [निन्दं (सी॰ पी॰) सं॰ नि॰ १.१८] अपबोधेति [अपबोधति (सी॰ स्या॰ पी॰)], अस्सो भद्रो कसामिव॥
इस संसार में कौन ऐसा पुरुष है, जो भर्त्सना/निन्दा और ग्लानिसे उसी प्रकार डरता है, जैसे चाबुक से अच्छा घोड़ा ।
Who in the world
is a man constrained by conscience,
who awakens to censure
like a fine stallion to the whip?
१४४.
अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठो, आतापिनो संवेगिनो भवाथ।
सद्धाय सीलेन च वीरियेन च, समाधिना धम्मविनिच्छयेन च।
सम्पन्नविज्जाचरणा पतिस्सता, जहिस्सथ [पहस्सथ (सी॰ स्या॰ पी॰)] दुक्खमिदं अनप्पकं॥
जैसे एक अच्छी नस्ल का घोड़ा चाबुक लगने पर तेज गति से दौड़ता है, वैसे ही तत्परता और संवेग (शीघ्रता) के साथ श्रद्धा, शील, वीर्य (उत्साह, लगन) और समाधि (मन की एकाग्रता) के द्वारा धर्म विनिश्चय कर (धर्म के सम्बन्ध में अपनी धारणा पक्की कर), विद्या और सदाचार से सम्पन्न होकर इस दारुण दुख से मुक्ति पा सकते हो।
Like a fine stallion
struck with a whip,
be ardent & chastened.
Through conviction
virtue, persistence,
concentration, judgment,
consummate in knowledge & conduct,
mindful,
you'll abandon this not-insignificant pain.
१४५.
उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति तेजनं।
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति सुब्बता॥
नहर बनाने वाले जलप्रवाह को मोड़ते हैं, बाण बनानेवाले बाणों की धार तेज करते हैं, बढ़ई काष्ठ को आकार देते हैं, सुन्दर व्रत का पालन करनेवाले अपने आपको ही दिशा देते हैं/दमन करते हैं।
Irrigators guide the water.
Fletchers shape the arrow shaft.
Carpenters shape the wood.
Those of good practices control
themselves.
Dandavagga: The Rod" (Dhp X), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.10.than.html .
हिन्दी अनुवाद: राजीव
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