१५७.
अत्तानञ्चे पियं जञ्ञा, रक्खेय्य नं सुरक्खितं।
तिण्णं अञ्ञतरं यामं, पटिजग्गेय्य पण्डितो॥
यदि अपने आप से प्यार है, तो स्वयं को सुरक्षित रखें। जो पण्डित हैं वे रात्रि के तीन प्रहरों में से एक प्रहर जागरण करते हैं ।
If you hold yourself dear
then guard, guard yourself well.
The wise person would stay awake
nursing himself
in any of the three watches of the night,
the three stages of life.
१५८.
अत्तानमेव पठमं, पतिरूपे निवेसये।
अथञ्ञमनुसासेय्य, न किलिस्सेय्य पण्डितो॥
पहले स्वयं शुभ कर्म का अभ्यास करे, उसके बाद दूसरों को उपदेश दे। ऐसा करने वाले पण्डित को क्लेश नहीं होता।
First
he'd settle himself
in what is correct,
only then
teach others.
He wouldn't stain his name
: he is wise.
१५९.
अत्तानं चे तथा कयिरा, यथाञ्ञमनुसासति।
सुदन्तो वत दमेथ, अत्ता हि किर दुद्दमो॥
पहले अपने को वैसा बनाएँ, जैसा दूसरों को अनुशासन के द्वारा बनाना चाहते हैं। पहले अपना भलीभाँति दमन करें, क्योंकि ख़ुद पर क़ाबू पाना कठिन है।
If you'd mold yourself
the way you teach others,
then, well-trained,
go ahead & tame —
for, as they say,
what's hard to tame is you
yourself.
१६०.
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
तुम ख़ुद अपने मालिक हो। तुम्हारे सिवा तुम्हारा कोई मालिक नहीं है। अपने ऊपर भलीभाँति नियंत्रण रखो, तो तुम ऐसे मालिक बनोगे,जो दुर्लभ है।
( बुद्ध कहते हैं कि तुम्हारा अपने ऊपर पूरा अधिकार है। तुमसे बढ़कर तुम्हारे ऊपर किसी का अधिकार नहीं है। लेकिन, इस अधिकार का सही प्रयोग तभी होगा, जब तुम स्वयं अपने ऊपर नियंत्रण रखोगे।)
Your own self is
your own mainstay,
for who else could your mainstay be?
With you yourself well-trained
you obtain the mainstay
hard to obtain.
१६१.
अत्तना हि कतं पापं, अत्तजं अत्तसम्भवं।
अभिमत्थति [अभिमन्तति (सी॰ पी॰)] दुम्मेधं, वजिरं वस्ममयं [वजिरंव’म्हमयं (स्या॰ क॰)] मणिं॥
अपने से ही उत्पन्न, अपने द्वारा ही किया गया पाप दुर्बुद्धि को उसी तरह मथता है, जैसे मणि पत्थर को काटता है।
The evil he himself has done
— self-born, self-created —
grinds down the dullard,
as a diamond, a precious stone.
१६२.
यस्स अच्चन्तदुस्सील्यं, मालुवा सालमिवोत्थतं।
करोति सो तथत्तानं, यथा नं इच्छती दिसो॥
जैसे मालुवा लता शाल वृक्ष के ऊपर छा जाती है (और उसे नष्ट कर देती है), वैसे ही जिसके दुराचरण में भारी वृद्धि होती है, वह अपने आपको इतनी क्षति पहुँचाता है, इतना अहित करता है, जितना उसके दुश्मन भी नहीं चाहते।
When overspread by extreme vice —
like a sal tree by a vine —
you do to yourself
what an enemy would wish.
१६३.
सुकरानि असाधूनि, अत्तनो अहितानि च।
यं वे हितञ्च साधुञ्च, तं वे परमदुक्करं॥
जो असाधु (अनुचित, गर्हित,) है और अपने लिए अहितकर है, वैसा कार्य करना आसान है, जो हितकारी और साधु (अच्छा) है वैसा कार्य करना अत्यंत कठिन है।
They're easy to do —
things of no good
& no use to yourself.
What's truly useful & good
is truly harder than hard to do.
१६४.
यो सासनं अरहतं, अरियानं धम्मजीविनं।
पटिक्कोसति दुम्मेधो, दिट्ठिं निस्साय पापिकं।
फलानि कट्ठकस्सेव, अत्तघाताय [अत्तघञ्ञाय (सी॰ स्या॰ पी॰)] फल्लति॥
जो धर्म के अनुसार जीवन जीते हैं, ऐसे आर्य (श्रेष्ठ) और अर्हन्त की शिक्षा का यदि कोई दुर्मति उपहास करता है, तो वह बाँस के फल की तरह अपने ही विनाश का कारण बनता है।
The teaching of those who live the Dhamma,
worthy ones, noble:
whoever maligns it
— a dullard,
inspired by evil view —
bears fruit for his own destruction,
like the fruiting of the bamboo.
१६५.
अत्तना हि [अत्तनाव (सी॰ स्या॰ पी॰)] कतं पापं, अत्तना संकिलिस्सति।
अत्तना अकतं पापं, अत्तनाव विसुज्झति।
सुद्धी असुद्धि पच्चत्तं, नाञ्ञो अञ्ञं [नाञ्ञमञ्ञो(सी॰)] विसोधये॥
अपने द्वारा किया गया पाप ही अपने आप को अपवित्र करता है। अपने द्वारा न किया गया पाप ही अपने आप को पवित्र रखता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपनी शुद्धि/अशुद्धि के लिए स्वयं ज़िम्मेवार है, कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का शुद्धीकरण नहीं कर सकता।
Evil is done by oneself
by oneself is one defiled.
Evil is left undone by oneself
by oneself is one cleansed.
Purity & impurity are one's own doing.
No one purifies another.
No other purifies one.
No other purifies one.
१६६.
अत्तदत्थं परत्थेन, बहुनापि न हापये।
अत्तदत्थमभिञ्ञाय, सदत्थपसुतो सिया॥
किसी और के स्वार्थ/हित के लिए अपने कल्याण की हानि न करें, भले ही वह स्वार्थ/हित कितना ही बड़ा क्यों न हो। अपना सच्चा कल्याण जानकर उसी में लगे रहें।
Don't sacrifice your own welfare
for that of another,
no matter how great.
Realizing your own true welfare,
be intent on just that.
अत्तवग्गो द्वादसमो निट्ठितो।
"Attavagga: Self" (Dhp XII), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.12.than.html .
हिन्दी अनुवाद: राजीव
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