Sunday, February 7, 2021

२५. भिक्खुवग्गो

३६०.

चक्खुना संवरो साधु, साधु सोतेन संवरो।

घानेन संवरो साधु, साधु जिव्हाय संवरो।

 

आँखों से संयम अच्छा है, कानों से संयम अच्छा है, नाक से संयम अच्छा है, जिह्वा से संयम अच्छा है।

 

Restraint with the eye is good,

good is restraint with the ear.

Restraint with the nose is good,

good is restraint with the tongue.

३६१.

कायेन संवरो साधु, साधु वाचाय संवरो।

मनसा संवरो साधु, साधु सब्बत्थ संवरो।

सब्बत्थ संवुतो भिक्खु, सब्बदुक्खा पमुच्‍चति॥

काया से संयम अच्छा है, वाणी से संयम अच्छा है, मन से संयम अच्छा है, सर्वत्र  संयम अच्छा है, जो भिक्षु सर्वत्र संयमित रहता है वह सभी दुःखों से मुक्त होता है।

Restraint with the body is good,

good is restraint with speech.

Restraint with the heart is good,

good is restraint   everywhere.

A monk everywhere restrained

is released from all suffering & stress.

 

 

 

३६२.

हत्थसंयतो पादसंयतो, वाचासंयतो संयतुत्तमो।

अज्झत्तरतो समाहितो, एको सन्तुसितो तमाहु भिक्खुं॥

जो हाथ, पैर, वाणी से संयत हो, जिसका संयम अत्यंत श्रेष्ठ कोटि का हो, जिसका ध्यान अपने अभ्यंतर की ओर केन्द्रित हो, जो अकेला हो और सन्तुष्ट हो, उसे मैं भिक्षु कहता हूँ।

Hands restrained,

feet restrained

speech restrained,

         supremely restrained —

delighting in what is inward,

content, centered, alone:

he's what they call

         a monk.

 

३६३.

यो मुखसंयतो भिक्खु, मन्तभाणी अनुद्धतो।

अत्थं धम्मञ्‍च दीपेति, मधुरं तस्स भासितं॥

जो मुख से संयत है, मनन करके बोलता है, उद्धत नहीं है, अर्थ और धर्म पर प्रकाश डालता है, उस भिक्षु की वाणी मधुर होती है।

A monk restrained in his speaking,

giving counsel unruffled,

declaring the message & meaning:

         sweet is his speech.

 

३६४.

धम्मारामो धम्मरतो, धम्मं अनुविचिन्तयं।

धम्मं अनुस्सरं भिक्खु, सद्धम्मा न परिहायति॥

 

धर्म में रमण करने वाला, धर्म में निमग्न रहने वाला, धर्म का बार-बार चिन्तन करने वाला, धर्म का अनुसरण करने वाला भिक्षु सद्धर्म से च्युत नहीं होता।

Dhamma his dwelling,

Dhamma his delight,

a monk pondering Dhamma,

         calling Dhamma to mind,

does not fall away

from true Dhamma.

 

३६५.

सलाभं नातिमञ्‍ञेय्य, नाञ्‍ञेसं पिहयं चरे।

अञ्‍ञेसं पिहयं भिक्खु, समाधिं नाधिगच्छति॥

अपने लाभ (हित) की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, दूसरे के लाभ का लोभ नहीं करना चाहिए, जो भिक्षु दूसरे से स्पृहा रखता है, वह समाधि (चित्त की एकाग्रता) प्राप्त नहीं करता।

         Gains:

don't treat your own with scorn,

don't go coveting those of others.

A monk who covets those of others

         attains

         no concentration.

 

 

३६६.

अप्पलाभोपि चे भिक्खु, सलाभं नातिमञ्‍ञति।

तं वे देवा पसंसन्ति, सुद्धाजीविं अतन्दितं॥

अल्प लाभ होने पर भी अपने लाभ की अवहेलना नहीं करनी चाहिए । शुद्ध आजीविका वाला और आलस्यरहित होकर कार्य करने वाले ऐसे भिक्षु को ही देवता पसन्द करते हैं।

Even if he gets next to nothing,

he doesn't treat his gains with scorn.

Living purely, untiring:

         he's the one

         that the devas praise

 

३६७.

सब्बसो नामरूपस्मिं, यस्स नत्थि ममायितं।

असता च न सोचति, स वे ‘‘भिक्खू’’ति वुच्‍चति॥

 

सभी नाम-रूपों में जिसका कोई ‘मेरा’ नहीं है, जो नहीं है, उसके लिए जो शोक नहीं करता, उसी को भिक्षु कहा जाता है।

For whom, in name & form

         in every way,

there's no sense of mine,

& who doesn't grieve

for what's not:

he's deservedly called

         a monk.

 

३६८.

मेत्ताविहारी यो भिक्खु, पसन्‍नो बुद्धसासने।

अधिगच्छे पदं सन्तं, सङ्खारूपसमं सुखं॥

जो भिक्षु सबके प्रति मैत्री भावना रखते हुए विहार करता है, जो बुद्ध की शिक्षा में प्रसन्न है, वह संस्कारों को शान्त करने वाली सुखद स्थिति को प्राप्त करता है ।

Dwelling in kindness, a monk

with faith in the Awakened One's teaching,

would attain the good state,

            the peaceful state:

stilling-of-fabrications ease.

 

३६९.

सिञ्‍च भिक्खु इमं नावं, सित्ता ते लहुमेस्सति।

छेत्वा रागञ्‍च दोसञ्‍च, ततो निब्बानमेहिसि॥

 

भिक्षु , इस नाव से पानी उलीचो, उलीचने से यह हल्की हो जाएगी । राग और द्वेष रूपी पानी को हटाने के बाद ही तुम्हें निर्वाण मिलेगा।

Monk, bail out this boat.

It will take you lightly when bailed.

Having cut through passion, aversion,

you go from there to Unbinding.

 

३७०.

पञ्‍च छिन्दे पञ्‍च जहे, पञ्‍च चुत्तरि भावये।

पञ्‍च सङ्गातिगो भिक्खु, ‘‘ओघतिण्णो’’ति वुच्‍चति॥

पाँच ( रूप, राग, मान, उद्धतपना और अविद्या) काटे, पाँच ( आत्मा की शाश्वतता में विश्वास, बुद्ध की शिक्षा पर अविश्वास, व्रत उपवास पर अधिक ज़ोर, भोग में आसक्ति और प्रतिहिंसा) का त्याग करे,  इसके बाद पाँच ( श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) की भावना/अभ्यास करे, पाँच ( राग, द्वेष, मोह, मान और झूठी धारणा ) का संसर्ग छोड़े। इसके बाद ही भिक्षु संसार रूपी जल-प्लावन को पार किया हुआ माना जाएगा ।

 

Cut through five,

let go of five,

& develop five above all.

A monk gone past five attachments

is said to have crossed the flood.

 

३७१.

झाय भिक्खु [झाय तुवं भिक्खु (?)] मा पमादो [मा च पमादो (सी॰ स्या॰ पी॰)], मा ते कामगुणे रमेस्सु [भमस्सु (सी॰ पी॰), भवस्सु (स्या॰), रमस्सु (क॰)] चित्तं।

मा लोहगुळं गिली पमत्तो, मा कन्दि ‘‘दुक्खमिद’’न्ति डय्हमानो॥

भिक्षु, ध्यान करो, प्रमाद न करो, अपने चित्त को काम गुणों में रमण न करने दो, प्रमत्त होकर जलता हुआ लौह-पिंड न निगलो और फिर यह कहकर रोओ नहीं कि बहुत दु:ख है।

Practice jhana, monk,

and don't be heedless.

Don't take your mind roaming

in sensual strands.

Don't swallow — heedless —

the ball of iron aflame.

Don't burn & complain: 'This is pain.'

 

३७२.

नत्थि झानं अपञ्‍ञस्स, पञ्‍ञा नत्थि अझायतो [अज्झायिनो (क॰)]

यम्हि झानञ्‍च पञ्‍ञा च, स वे निब्बानसन्तिके॥

जो प्रज्ञाहीन हैं उनसे ध्यान नहीं होता और ध्यान के बिना प्रज्ञा नहीं। जिनके पास ध्यान है और प्रज्ञा भी, वे निर्वाण के निकट हैं।

There's     no jhana

         for one with   no discernment,

                        no

discernment

         for one with   no jhana.

         But one with   both jhana

                        &

discernment:

he's on the verge

            of Unbinding.

 

३७३.

सुञ्‍ञागारं पविट्ठस्स, सन्तचित्तस्स भिक्खुनो।

अमानुसी रति होति, सम्मा धम्मं विपस्सतो॥

सूने गृह में प्रवेश कर शान्त चित्त से भिक्षु सही धर्म का दर्शन करे । यह मानव के लिए दुर्लभ आनन्द है।

 

A monk with his mind at peace,

going into an empty dwelling,

clearly seeing the Dhamma aright:

         his delight is more

         than human.

 

३७४.

यतो यतो सम्मसति, खन्धानं उदयब्बयं।

लभती [लभति (पी॰), लभते (क॰)] पीतिपामोज्‍जं, अमतं तं विजानतं॥

 

जैसे-जैसे भिक्षु स्कन्धों (रूप,वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान) के उदय और अस्त पर विचार करता जाता है, वैसे ही वह ज्ञानियों को सुलभ प्रीति और प्रमोद (आनन्द) रूपी अमृत प्राप्त करता है।

However it is,

however it is he touches

the arising-&-passing of aggregates:

he gains rapture & joy:

         that, for those who know it,

            is deathless,

            the Deathless.

 

३७५.

तत्रायमादि भवति, इध पञ्‍ञस्स भिक्खुनो।

इन्द्रियगुत्ति सन्तुट्ठि, पातिमोक्खे च संवरो॥

यहाँ बुद्धिमान (प्राज्ञ) भिक्षु को आरम्भ में इन्द्रिय संयम, सन्तोष और प्रतिमोक्ष (भिक्षुओं के आचार नियम) का पालन करना चाहिए ।



Here the first things

for a discerning monk

are     guarding the senses,

         contentment,

         restraint in line with the Patimokkha.

 

 

३७६.

मित्ते भजस्सु कल्याणे, सुद्धाजीवे अतन्दिते।

पटिसन्थारवुत्यस्स [पटिसन्धारवुत्यस्स (क॰)], आचारकुसलो सिया।

ततो पामोज्‍जबहुलो, दुक्खस्सन्तं करिस्सति॥

अच्छे मित्रों की संगति करो, शुद्ध आजीविका अपनाओ, आलस्य न करो, दूसरों का आदर-सत्कार करने वाला बनो, आचार कुशल बनो, इससे तुम्हें बहुत आनन्द मिलेगा और दुःखों की शान्ति होगी।

He should associate with admirable friends.

Living purely, untiring,

         hospitable by habit,

         skilled in his conduct,

         gaining a manifold joy,

he will put an end

to suffering & stress.

 

३७७.

वस्सिका विय पुप्फानि, मद्दवानि [मज्‍जवानि (क॰ टीका) पच्‍चवानि (क॰ अट्ठ॰)] पमुञ्‍चति।

एवं रागञ्‍च दोसञ्‍च, विप्पमुञ्‍चेथ भिक्खवो॥

जैसे जूही अपने मुरझाये फूलों को गिरा देती है, वैसे ही अपने राग-द्वेष त्याग दो।

Shed passion

& aversion, monks —

as a jasmine would,

its withered flowers.

 

३७८.

सन्तकायो सन्तवाचो, सन्तवा सुसमाहितो [सन्तमनो सुसमाहितो (स्या॰ पी॰), सन्तमनो समाहितो (क॰)]

वन्तलोकामिसो भिक्खु, ‘‘उपसन्तो’’ति वुच्‍चति॥

जिसकी काया शान्त है, जिसकी वाणी शान्त है, जिसका मन शान्त है, जिसका चित्त अच्छी तरह एकाग्र है, जिसने लौकिक कामनाओं का अन्त कर दिया है, वैसे भिक्षु को उपशान्त कहा जाता है।

Calmed in body,

calmed in speech,

well-centered & calm,

having disgorged the baits of the world,

a monk is called

         thoroughly

         calmed.

 

३७९.

अत्तना चोदयत्तानं, पटिमंसेथ अत्तना [पटिमासे अत्तमत्तना (सी॰ पी॰), पटिमंसे तमत्तना (स्या॰)]

सो अत्तगुत्तो सतिमा, सुखं भिक्खु विहाहिसि॥

जो अपने आपको प्रेरित करता है, जो अपनी ही जाँच करता रहता है, वैसा आत्मसंयमी स्मृतिमान भिक्षु सुख में विहार करता है।

You yourself should reprove yourself,

                should examine

yourself.

As a self-guarded monk

with guarded self,

mindful, you dwell at ease.

 

 

३८०.

अत्ता हि अत्तनो नाथो, (को हि नाथो परो सिया) [( ) विदेसपोत्थकेसु नत्थि]

अत्ता हि अत्तनो गति।

तस्मा संयममत्तानं [संयमय’त्तानं (सी॰ पी॰)], अस्सं भद्रंव वाणिजो॥

 

तुम ख़ुद अपने स्वामी हो, तुम्हारा और कोई स्वामी नहीं है, तुम्हारी सुगति/ दुर्गति के तुम ख़ुद ज़िम्मेदार हो। इसलिए अपने आपको उसी प्रकार संयमित करो जैसे वणिक अपने अच्छे घोड़े की देख-भाल करता है।

Your own self is

your own mainstay.

Your own self is

your own guide.

Therefore you should

watch over yourself —

as a trader, a fine steed.

 

३८१.

पामोज्‍जबहुलो भिक्खु, पसन्‍नो बुद्धसासने।

अधिगच्छे पदं सन्तं, सङ्खारूपसमं सुखं॥

जो भिक्षु बहुविध आनन्द से भरा हुआ है, जो बुद्ध की शिक्षा में प्रसन्न है, वह अपने संस्कारों को शान्त कर सुख और शान्त स्थिति प्राप्त करता है।

A monk with a manifold joy,

with faith in the Awakened One's teaching,

would attain the good state,

            the peaceful state:

stilling-of-fabrications ease.

 

 

३८२.

यो हवे दहरो भिक्खु, युञ्‍जति बुद्धसासने।

सोमं [सो इमं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] लोकं पभासेति, अब्भा मुत्तोव चन्दिमा॥

 

जो भिक्षु तरुणाई में ही बुद्ध की शिक्षा से जुड़ जाता है, वह मेघमुक्त चन्द्रमा की तरह इस लोक को आलोकित करता है।

 

A young monk who strives

in the Awakened One's teaching,

         brightens the world

like the moon set free from a cloud.

 

 

भिक्खुवग्गो पञ्‍चवीसतिमो निट्ठितो।

 

"Bhikkhuvagga: Monks" (Dhp XXV), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.25.than.html .

 

हिन्दी अनुवाद : राजीव 

 

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