मनुजस्स पमत्तचारिनो, तण्हा वड्ढति मालुवा विय।
सो प्लवती [प्लवति (सी॰ पी॰), पलवेती (क॰), उप्लवति (?)] हुरा हुरं, फलमिच्छंव वनस्मि वानरो॥
प्रमत्त (प्रमाद के वशीभूत) आचरण करने वाले मनुष्य की तृष्णा मालुवा लता की तरह बढ़ती जाती है। वह वन में फल की खोज में डाली-डाली कूदते -फलाँगते वानरों की तरह दिन रात यहाँ से वहाँ दौड़ता रहता है।
When a person lives heedlessly,
his craving grows like a creeping vine.
He runs now here
& now there,
as if looking for fruit:
a monkey in the forest.
यं एसा सहते जम्मी, तण्हा लोके विसत्तिका।
सोका तस्स पवड्ढन्ति, अभिवट्ठंव [अभिवड्ढंव (स्या॰), अभिवट्टंव (पी॰), अभिवुड्ढंव (क॰)] बीरणं॥
जिसे इस लोक में बार-बार जन्म लेनेवाली यह ज़हरीली तृष्णा पकड़ लेती है, उसके शोक जंगली घास-पात की तरह बढ़ते ही जाते हैं।
If this sticky, uncouth craving
overcomes you in the world,
your sorrows grow like wild grass
after rain.
यो चेतं सहते जम्मिं, तण्हं लोके दुरच्चयं।
सोका तम्हा पपतन्ति, उदबिन्दुव पोक्खरा॥
जो इस लोक में निरन्तर जन्म लेनेवाली दुस्त्याज्य (जिसे छोड़ना कठिन है) तृष्णा को पराजित करता है, उसके शोक कमल पर जल की बूँदों की तरह नीचे गिर जाते हैं ।
If, in the world, you overcome
this uncouth craving, hard to escape,
sorrows roll off you,
like water beads off
a lotus.
तं वो वदामि भद्दं वो, यावन्तेत्थ समागता।
तण्हाय मूलं खणथ, उसीरत्थोव बीरणं।
मा वो नळंव सोतोव, मारो भञ्जि पुनप्पुनं॥
इसलिए जो यहाँ उपस्थित हैं,उन सबसे कहता हूँ कि आपका कल्याण हो। आप तृष्णा को उसी तरह जड़ से उखाड़ फेकें, जैसे जंगली घास-पात को जड़ से उखाड़ते हैं। जैसे तेज धारा वाली नदी सरकंडे को तोड़ देती है, वैसे ही मार को बार-बार आघात करने का मौक़ा न दें।
To all of you gathered here
I say: Good fortune.
Dig up craving
— as when seeking medicinal roots, wild grass —
by the root.
Don't let Mara cut you down
— as a raging river, a reed —
over & over again.
यथापि मूले अनुपद्दवे दळ्हे, छिन्नोपि रुक्खो पुनरेव रूहति।
एवम्पि तण्हानुसये अनूहते, निब्बत्तती दुक्खमिदं पुनप्पुनं॥
जैसे कटा हुआ पेड़, यदि उसका जड़ पूरी तरह उखाड़ा नहीं गया हो, फिर से पनप जाता है, उसी प्रकार अवशिष्ट (सुसुप्त) तृष्णा भी पूरी तरह नष्ट न हो तो दुख का बार-बार आगमन होता है।
If its root remains
undamaged & strong,
a tree, even if cut,
will grow back.
So too if latent craving
is not rooted out,
this suffering returns
again
&
again.
यस्स छत्तिंसति सोता, मनापसवना भुसा।
माहा [वाहा (सी॰ स्या॰ पी॰)] वहन्ति दुद्दिट्ठिं, सङ्कप्पा रागनिस्सिता॥
जिस व्यक्ति की छत्तीस मनोधाराएँ ( मन का रुझान) मनपसन्द चीजों की ओर निरन्तर बहती रहती हैं, उस ग़लत दृष्टि वाले व्यक्ति को उसके राग आधारित संकल्प ही बहा ले जाते हैं।
He whose 36 streams,
flowing to what is appealing, are strong:
the currents — resolves based on passion —
carry him, of base views, away.
सवन्ति सब्बधि सोता, लता उप्पज्ज [उब्भिज्ज (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] तिट्ठति।
तञ्च दिस्वा लतं जातं, मूलं पञ्ञाय छिन्दथ॥
धारा चारों तरफ़ बहती है और उनके बीच उर्वरित लता खड़ी रहती है। तृष्णा रूपी उस लता के जन्म लेते ही अपनी प्रज्ञा से उसकी जड़ काटो।
They flow every which way, the streams,
but the sprouted creeper stays
in place.
Now, seeing that the creeper's arisen,
cut through its root
with discernment.
सरितानि सिनेहितानि च, सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो।
ते सातसिता सुखेसिनो, ते वे जातिजरूपगा नरा॥
स्नेह (राग) की सरिता बह रही है, जो प्राणियों के मन को भाती है। सुख की खोज में इस सरिता पर आश्रित मानव जन्म और जरा (बुढ़ापा) प्राप्त करते हैं।
Loosened & oiled
are the joys of a person.
People, bound by enticement,
looking for ease:
to birth & aging they go.
तसिणाय पुरक्खता पजा, परिसप्पन्ति ससोव बन्धितो [बाधितो (बहूसु)]।
संयोजनसङ्गसत्तका, दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय॥
तृष्णा के पीछे लगे प्राणी बँधे ख़रगोश की तरह चक्कर काटते रहते हैं । संयोजनों (संस्कार और बन्धनों) में फँसे लोग चिरकाल तक बार-बार दुख प्राप्त करते हैं।
Encircled with craving,
people hop round & around
like a rabbit caught in a snare.
Tied with fetters & bonds
they go on to suffering,
again & again, for long.
तसिणाय पुरक्खता पजा, परिसप्पन्ति ससोव बन्धितो।
तस्मा तसिणं विनोदये, आकङ्खन्त [भिक्खू आकङ्खी (सी॰), भिक्खु आकङ्खं (स्या॰)] विरागमत्तनो॥
तृष्णा के पीछे लगे प्राणी बँधे ख़रगोश की तरह चक्कर काटते रहते हैं । इसलिए अपने वैराग्य की इच्छा रखने वाले भिक्षुओं को तृष्णा दूर रखनी चाहिए।
Encircled with craving,
people hop round & around
like a rabbit caught in a snare.
So a monk
should dispel craving,
should aspire to dispassion
for himself.
यो निब्बनथो वनाधिमुत्तो, वनमुत्तो वनमेव धावति।
तं पुग्गलमेथ पस्सथ, मुत्तो बन्धनमेव धावति॥
जो तृष्णा के जंगल से मुक्त होकर, अच्छी तरह मुक्त होकर, फिर उसी जंगल की ओर दौड़ता है, उस व्यक्ति के बारे में यही समझो कि जैसे बन्धन से मुक्त करने पर वह फिर बन्धनों की ओर ही भागता है।
Cleared of the underbrush
but obsessed with the forest,
set free from the forest,
right back to the forest he runs.
Come, see the person set free
who runs right back to the same old chains!
न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा, यदायसं दारुजपब्बजञ्च [दारूजं बब्बजञ्च (सी॰ पी॰)]।
सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु, पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा॥
यह जो लोहे, लकड़ी और रस्सी के बन्धन हैं, इन्हें धीर जन पक्के बन्धन नहीं कहते। मणि और कुण्डल, पुत्रों और दारा में अनुरक्ति ही बड़े बन्धन हैं।
That's not a strong bond
— so say the enlightened —
the one made of iron, of wood, or of grass.
To be smitten, enthralled,
with jewels & ornaments,
longing for children & wives:
एतं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा, ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं।
एतम्पि छेत्वान परिब्बजन्ति, अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय॥
धीर जनों का कहना है कि ये ही दृढ़ बन्धन हैं, जो मनुष्य को नीचे खींचते हैं, उन्हें शिथिल करते हैं (उन्हें थकाते हैं), उनसे मुक्ति कठिन है। धीर जन इन बन्धनों को काटकर, कामसुख त्याग कर, अनपेक्षी बनकर संन्यास ग्रहण करते हैं।
that's the strong bond,
— so say the enlightened —
one that's constraining,
elastic,
hard to untie.
But having cut it, they
— the enlightened — go forth,
free of longing, abandoning
sensual ease.
ये रागरत्तानुपतन्ति सोतं, सयंकतं मक्कटकोव जालं।
एतम्पि छेत्वान वजन्ति धीरा, अनपेक्खिनो सब्बदुक्खं पहाय॥
जैसे मकड़ी अपने ही बनाये जाल में फँस जाती है, वैसे ही राग में अनुरक्त जन संसार प्रवाह में गिर जाता है। धीर जन इस राग को भी काटकर, अपेक्षा रहित होकर, सब दुख छोड़कर संन्यास लेते हैं।
Those smitten with passion
fall back
into a self-made stream,
like a spider snared in its web.
But, having cut it, the enlightened set forth,
free of longing, abandoning
all suffering & stress.
मुञ्च पुरे मुञ्च पच्छतो, मज्झे मुञ्च भवस्स पारगू।
सब्बत्थ विमुत्तमानसो, न पुनं जातिजरं उपेहिसि॥
आगे, पीछे और मध्य ( भविष्य, अतीत और वर्तमान) से मुक्त होकर तुम संसार को पार कर लो। सब ओर से विमुक्त मन वाला फिर से जन्म-जरा प्राप्त नहीं करता।
Gone to the beyond of becoming,
you let go of in front,
let go of behind,
let go of between.
With a heart everywhere let-go,
you don't come again to birth
& aging.
वितक्कमथितस्स जन्तुनो, तिब्बरागस्स सुभानुपस्सिनो।
भिय्यो तण्हा पवड्ढति, एस खो दळ्हं [एस गाळ्हं (क॰)] करोति बन्धनं॥
जिसका मन संकल्प-विकल्प से उद्वेलित होता रहता है, जिसमें तीव्र राग है, जो हर जगह शुभ ही शुभ देखता है, उसकी तृष्णा और बढ़ती है, वह वस्तुतः अपने बन्धनों को और मज़बूत बनाता है।
For a person
forced on by his thinking,
fierce in his passion,
focused on beauty,
craving grows all the more.
He's the one
who tightens the bond.
वितक्कूपसमे च [वितक्कूपसमेव (क॰)] यो रतो, असुभं भावयते सदा सतो।
एस [एसो (?)] खो ब्यन्ति काहिति, एस [एसो (?)] छेच्छति मारबन्धनं॥
जो वितर्क (संकल्प-विकल्प, उधेड़बुन) को शान्त करने में लगा रहता है, जो अशुभ देखता है और जागरूक रहता है, वही इन्हें अन्त करता है, वही मार का बन्धन काटता है।
But one who delights
in the stilling of thinking,
always mindful
cultivating
a focus on the foul:
He's the one
who will make an end,
the one who will cut Mara's bond.
निट्ठङ्गतो असन्तासी, वीततण्हो अनङ्गणो।
अच्छिन्दि भवसल्लानि, अन्तिमोयं समुस्सयो॥
जिसे निष्ठा ( सत्य का साक्षात्कार) मिल गयी है, जिसे कोई डर नहीं है, जिसकी तृष्णा समाप्त हो गयी है, जिसके दोष मिट गये हैं, वह संसार रूपी शूल को उखाड़ेगा । यह उसका अन्तिम जन्म है।
Arrived at the finish,
unfrightened, unblemished, free
of craving, he has cut away
the arrows of becoming.
This physical heap is his last.
वीततण्हो अनादानो, निरुत्तिपदकोविदो।
अक्खरानं सन्निपातं, जञ्ञा पुब्बापरानि च।
स वे ‘‘अन्तिमसारीरो, महापञ्ञो महापुरिसो’’ति वुच्चति॥
जिसकी तृष्णा मिट गयी है, जो अपरिग्रही है, जो पदों की निरुक्ति जानता है, जो अक्षरों का क्रम निर्धारण (व्याकरण) जानता है, उस महापुरुष, महाप्रज्ञ के बारे में कहा जाता है कि उसका यह अन्तिम शरीर है।
Free from craving,
ungrasping,
astute in expression,
knowing the combination of sounds —
which comes first & which after.
He's called a
last-body
greatly discerning
great man.
सब्बाभिभू सब्बविदूहमस्मि, सब्बेसु धम्मेसु अनूपलित्तो।
सब्बञ्जहो तण्हक्खये विमुत्तो, सयं अभिञ्ञाय कमुद्दिसेय्यं॥
मैंने सबको जीता है, मैं सर्वविद हूँ, मैं सब धर्मों (स्थितियों ) से अलिप्त हूँ, मैंने सबकुछ त्यागा है, मेरी तृष्णा नष्ट हुई है और मैं मुक्त हूँ। मैंने स्वयं जाना है, मैं किससे उपदेश लूँ?
All-conquering,
all-knowing am I,
with regard to all things,
unadhering.
All-abandoning,
released in the ending of craving:
having fully known on my own,
to whom should I point as my teacher?
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति, सब्बरसं धम्मरसो जिनाति।
सब्बरतिं धम्मरति जिनाति, तण्हक्खयो सब्बदुक्खं जिनाति॥
सब प्रकार के दान पर धर्म का दान , सभी रसों पर धर्म का रस, सब प्रकार की रति पर धर्म में रति विजय प्राप्त करती है। तृष्णा क्षय सभी दुःखों पर विजयी होता है।
A gift of Dhamma conquers all gifts;
the taste of Dhamma, all tastes;
a delight in Dhamma, all delights;
the ending of craving, all suffering
& stress.
हनन्ति भोगा दुम्मेधं, नो च पारगवेसिनो।
भोगतण्हाय दुम्मेधो, हन्ति अञ्ञेव अत्तनं॥
संसार को पार करने की कोशिश न करनेवाले दुर्बुद्धि मनुष्य को भोग मार डालता है। भोग की तृष्णा में दुर्बुद्धि मनुष्य किसी अन्य की हत्या के समान ही अपनी हत्या कर लेता है।
Riches ruin the man
weak in discernment,
but not those who seek
the beyond.
Through craving for riches
the man weak in discernment
ruins himself
as he would others.
तिणदोसानि खेत्तानि, रागदोसा अयं पजा।
तस्मा हि वीतरागेसु, दिन्नं होति महप्फलं॥
खेत का दोष तृण है, इस प्रजा का दोष राग है, इसलिए जो वीतरागी है उसे दान करने में महाफल है।
Fields are spoiled by weeds;
people, by passion.
So what's given to those
free of passion
bears great fruit.
तिणदोसानि खेत्तानि, दोसदोसा अयं पजा।
तस्मा हि वीतदोसेसु, दिन्नं होति महप्फलं॥
खेत का दोष तृण है, इस प्रजा का दोष द्वेष है, इसलिए जो द्वेषरहित है उसे दान करने में महाफल है।
Fields are spoiled by weeds;
people, by aversion.
So what's given to those
free of aversion
bears great fruit.
तिणदोसानि खेत्तानि, मोहदोसा अयं पजा।
तस्मा हि वीतमोहेसु, दिन्नं होति महप्फलं॥
खेत का दोष तृण है, इस प्रजा का दोष मोह है, इसलिए जो मोहातीत है उसे दान करने में महाफल है।
Fields are spoiled by weeds;
people, by delusion.
So what's given to those
free of delusion
bears great fruit.
(तिणदोसानि खेत्तानि, इच्छादोसा अयं पजा।
तस्मा हि विगतिच्छेसु, दिन्नं होति महप्फलं॥) [( ) विदेसपोत्थकेसु नत्थि, अट्ठकथायम्पि न दिस्सति]
तिणदोसानि खेत्तानि, तण्हादोसा अयं पजा।
तस्मा हि वीततण्हेसु, दिन्नं होति महप्फलं॥
खेत का दोष तृण है, इस प्रजा का दोष इच्छा/तृष्णा है, इसलिए जो विगतेच्छ/ तृष्णा रहित है उसे दान करने में महाफल है।
Fields are spoiled by weeds;
people, by longing.
So what's given to those
free of longing
bears great fruit.
तण्हावग्गो चतुवीसतिमो निट्ठितो।
Tanhavagga: Craving" (Dhp XXIV), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.24.than.html .
हिन्दी अनुवाद: राजीव
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