Saturday, September 12, 2020

२१. पकिण्णकवग्गो

२९०.

मत्तासुखपरिच्‍चागा , पस्से चे विपुलं सुखं।

चजे मत्तासुखं धीरो, सम्पस्सं विपुलं सुखं॥

यदि अल्प सुख का परित्याग करने से विपुल सुख दिखता हो, तो धीर पुरुष विपुल सुख देखते हुए अल्प सुख छोड़ता है।

If, by forsaking

a limited ease,

he would see

an abundance of ease,

the enlightened man

would forsake

the limited ease

for the sake

of the abundant.

 

२९१.

परदुक्खूपधानेन, अत्तनो [यो अत्तनो (स्या॰ पी॰ क॰)] सुखमिच्छति।

वेरसंसग्गसंसट्ठो, वेरा सो न परिमुच्‍चति॥

जो दूसरे को दु:ख देकर अपना सुख चाहता है, वह वैर भावना से संलिप्त होने के कारण वैर से मुक्त नहीं हो पाता।

He wants his own ease

by giving others dis-ease.

Intertwined in the inter-

action of hostility,

from hostility

he's not set free.

 

 

२९२.

यञ्हि किच्‍चं अपविद्धं [तदपविद्धं (सी॰ स्या॰)], अकिच्‍चं पन कयिरति।

उन्‍नळानं पमत्तानं, तेसं वड्ढन्ति आसवा॥

जो कर्तव्य है वह नहीं करता, लेकिन जो अकरणीय है, उसे बार-बार करता है। ऐसे मल से भरे प्रमादी पुरुष के आस्रव बढ़ते हैं।

In those who

reject what should,

& do what shouldn't be done

 — heedless, insolent —

effluents grow.

 

२९३.

येसञ्‍च सुसमारद्धा, निच्‍चं कायगता सति।

अकिच्‍चं ते न सेवन्ति, किच्‍चे सातच्‍चकारिनो।

सतानं सम्पजानानं, अत्थं गच्छन्ति आसवा॥

जो हमेशा अपनी काया के सम्बन्ध में स्मृति रखते हैं ( अर्थात् वे हमेशा याद रखते हैं कि उनकी काया से दुराचरण नहीं हो रहा है ), जो अकरणीय है, उसे नहीं करते और निरन्तर करणीय कार्य में लगे रहते हैं, ऐसे स्मृतिवान और सचेत व्यक्ति के आस्रव नष्ट होते हैं।

 

But for those who

are well-applied, constantly,

to mindfulness immersed in the body;

don't indulge

in what shouldn't be done

& persist

in what should

 — mindful, alert —

effluents come to an end.

 

२९४.

मातरं पितरं हन्त्वा, राजानो द्वे च खत्तिये।

रट्ठं सानुचरं हन्त्वा, अनीघो याति ब्राह्मणो॥

माता(तृष्णा), पिता (अहंकार), दो क्षत्रिय राजाओं ( दो दर्शन- शाश्वतवाद और जड़वाद ) उनके अनुचर (राग) सहित पूरे राष्ट्र (रूप,विज्ञान आदि )को मारकर ब्राह्मण निष्पाप बनता है।

Having killed mother & father,

two warrior kings,

the kingdom & its dependency —

the brahman, untroubled, travels on.

 

२९५.

मातरं पितरं हन्त्वा, राजानो द्वे च सोत्थिये।

वेयग्घपञ्‍चमं हन्त्वा, अनीघो याति ब्राह्मणो॥

माता, पिता, दो श्रोत्रीय राजाओं ( दो चरम दृष्टिकोण)और पाँचवें बाघ ( पाँच मानसिक बाधाएँ) को मारकर ब्राह्मण निष्पाप बनता है।

 

Having killed mother & father,

two learned kings,

&, fifth, a tiger —

the brahman, untroubled, travels on.

 

२९६.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, निच्‍चं बुद्धगता सति॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनकी स्मृति बुद्ध में बनी रहती है( अर्थात् उन्हें बुद्ध की शिक्षा का हमेशा ख़्याल रहता है।)

They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose mindfulness, both day & night,

is constantly immersed

         in the Buddha.

 

२९७.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, निच्‍चं धम्मगता सति॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनकी स्मृति धर्म में बनी रहती है( अर्थात् उन्हें धर्म का हमेशा ख़्याल रहता है।)

 

They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose mindfulness, both day & night,

is constantly immersed

         in the Dhamma

 

२९८.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, निच्‍चं सङ्घगता सति॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनकी स्मृति संघ में बनी रहती है( अर्थात् उन्हें संघ का  हमेशा ख़्याल रहता है।)

 

They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose mindfulness, both day & night,

is constantly immersed

         in the Sangha.

 

२९९.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, निच्‍चं कायगता सति॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनकी स्मृति काया में बनी रहती है( अर्थात् उन्हें काया से किये जानेवाले आचरण का हमेशा ख़्याल रहता है।)

 


They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose mindfulness, both day & night,

is constantly immersed

         in the body.

 

३००.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, अहिंसाय रतो मनो॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनका मन अहिंसक रहता  है।

 

They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose hearts delight, both day & night,

         in harmlessness.

 

३०१.

सुप्पबुद्धं पबुज्झन्ति, सदा गोतमसावका।

येसं दिवा च रत्तो च, भावनाय रतो मनो॥

गौतम के शिष्य सुप्रबुद्ध हैं, वे हमेशा सजग रहते हैं, दिन रात उनका मन  भावना ( मन को उच्चतर स्थिति में रखने के लिए किया गया प्रयास, ध्यान आदि) में लगा रहता  है।

 


They awaken, always wide awake:

         Gotama's disciples

whose hearts delight, both day & night,

         in developing the mind.

 

३०२.

दुप्पब्बज्‍जं दुरभिरमं, दुरावासा घरा दुखा।

दुक्खोसमानसंवासो, दुक्खानुपतितद्धगू।

तस्मा न चद्धगू सिया, न च [तस्मा न चद्धगू न च (क॰)] दुक्खानुपतितो सिया [दुक्खानुपातितो (?)]

कठिन संन्यास अपनाने में कष्ट है, न रहने योग्य घर में रहना दुखद है, असमान के साथ रहना कष्टकर है, पथिक बने रहने में दुख है, इसलिए पथिक न बनें, दुखी न रहें।

Hard   is the life gone forth,

         hard   to delight in.

         Hard   is the miserable

            householder's life.

It's painful    to stay with dissonant people,

painful     to travel the road.

         So be  neither traveler

                nor pained.

 

 

३०३.

सद्धो सीलेन सम्पन्‍नो, यसोभोगसमप्पितो।

यं यं पदेसं भजति, तत्थ तत्थेव पूजितो॥

श्रद्धा और शील से सम्पन्न यश और भोग से युक्त पुरुष जहाँ भी जाता है, वहाँ आदर पाता है।

The man of conviction

endowed with virtue,

glory, & wealth:

wherever he goes

he is honored.

 

 

३०४.

दूरे सन्तो पकासेन्ति, हिमवन्तोव पब्बतो।

असन्तेत्थ न दिस्सन्ति, रत्तिं खित्ता यथा सरा॥

सन्त दूर से ही आलोकित करते हैं, जैसे  हिमाच्छादित पर्वत , जबकि असन्त (दुर्जन) रात में फेंके गये वाण की तरह नज़दीक में भी नहीं दिखते।

The good shine from afar

like the snowy Himalayas.

The bad don't appear

even when near,

like arrows shot into the night.

 

 

३०५.

एकासनं एकसेय्यं, एको चरमतन्दितो।

एको दमयमत्तानं, वनन्ते रमितो सिया॥

अकेला बैठे, अकेला सोये, अकेला ही विचरण करे, वन में अकेले अपना दमन कर रमण करे।

Sitting alone,

resting alone,

walking alone,

untiring.

Taming himself,

he'd delight alone —

         alone in the forest.

 

पकिण्णकवग्गो एकवीसतिमो निट्ठितो।

 

English translation: Pakinnakavagga: Miscellany" (Dhp XXI), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.21.than.html 

 

हिन्दी अनुवाद: राजीव 

 

Tuesday, September 8, 2020

२०. मग्गवग्गो


२७३.

मग्गानट्ठङ्गिको सेट्ठो, सच्‍चानं चतुरो पदा।

विरागो सेट्ठो धम्मानं, द्विपदानञ्‍च चक्खुमा॥

मार्गों में अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है, सत्यों में चार पद (चार आर्यसत्य) श्रेष्ठ हैं, धर्मों में वैराग्य श्रेष्ठ है, द्विपदों ( मनुष्यों) में देखने वाला (बुद्ध) श्रेष्ठ है।

Of all the paths the Eightfold Path is the best; of all the truths the Four Noble Truths are the best; of all things passionlessness is the best: of men the Seeing One (the Buddha) is the best.

 

२७४.

एसेव [एसोव (सी॰ पी॰)] मग्गो नत्थञ्‍ञो, दस्सनस्स विसुद्धिया।

एतञ्हि तुम्हे पटिपज्‍जथ, मारस्सेतं पमोहनं॥

दृष्टि की विशुद्धि के लिए केवल यही एक मार्ग है, कोई और नहीं। तुम इसी मार्ग पर चलो, यह मार्ग मार को भ्रम में डालता है।

This is the only path; there is none other for the purification of insight. Tread this path, and you will bewilder Mara.

 

२७५.

एतञ्हि तुम्हे पटिपन्‍ना, दुक्खस्सन्तं करिस्सथ।

अक्खातो वो [अक्खातो वे (सी॰ पी॰)] मया मग्गो, अञ्‍ञाय सल्‍लकन्तनं [सल्‍लसन्थनं (सी॰ पी॰), सल्‍लसत्थनं (स्या॰)]

इस मार्ग पर चलकर तुम दु:ख का अन्त कर सकोगे । राग आदि को  समूल नष्ट करने के लिए शल्य (चिकित्सा) के समान इस मार्ग को जानकर मैंने इसका वर्णन किया है ।

Walking upon this path you will make an end of suffering. Having discovered how to pull out the thorn of lust, I make known the path.

 

२७६.

तुम्हेहि किच्‍चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।

पटिपन्‍ना पमोक्खन्ति, झायिनो मारबन्धना॥

(इस मार्ग पर) तुम्हें स्वयं उद्योग करना है, तथागत केवल राह दिखलाते हैं। इस मार्ग पर चलकर ध्यान करने वाले मार के बन्धन से छूट जाते हैं।

You yourselves must strive; the Buddhas only point the way. Those meditative ones who tread the path are released from the bonds of Mara.

 

 

२७७.

‘‘सब्बे सङ्खारा अनिच्‍चा’’ति, यदा पञ्‍ञाय पस्सति।

अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया॥

“सभी संस्कार ( विभिन्न तत्वों के मेल से बनी यह देह या मनोभाव आदि) अनित्य हैं” जो अपनी प्रज्ञा से यह समझता है, उसे दुःख से निर्वेद हो जाता है। यही विशुद्धि का मार्ग है।

All conditioned things are impermanent" — when one sees this with wisdom, one turns away from suffering. This is the path to purification.

 

२७८.

‘‘सब्बे सङ्खारा दुक्खा’’ति, यदा पञ्‍ञाय पस्सति।

अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया॥

सभी संस्कार दु:ख हैं” जो अपनी प्रज्ञा से यह समझता है, उसे दुःख से निर्वेद हो जाता है। यही विशुद्धि का मार्ग है।

 

All conditioned things are unsatisfactory" — when one sees this with wisdom, one turns away from suffering. This is the path to purification.

 

२७९.

‘‘सब्बे धम्मा अनत्ता’’ति, यदा पञ्‍ञाय पस्सति।

अथ निब्बिन्दति दुक्खे, एस मग्गो विसुद्धिया॥

सभी धर्म अनात्म हैं” जो अपनी प्रज्ञा से यह समझता है, उसे दुःख से निर्वेद हो जाता है। यही विशुद्धि का मार्ग है।

 

All things are not-self" — when one sees this with wisdom, one turns away from suffering. This is the path to purification.

 

२८०.

उट्ठानकालम्हि अनुट्ठहानो, युवा बली आलसियं उपेतो।

संसन्‍नसङ्कप्पमनो [असम्पन्‍नसङ्कप्पमनो (क॰)] कुसीतो, पञ्‍ञाय मग्गं अलसो न विन्दति॥

जो परिश्रम करने के समय परिश्रम नहीं करता, जो युवा और सबल होते हुए भी आलसी है, जिसके मन में कोई संकल्प नहीं है, जो दीर्घसूत्री है, ऐसा आलसी व्यक्ति प्रज्ञा का मार्ग नहीं पाता।

The idler who does not exert himself when he should, who though young and strong is full of sloth, with a mind full of vain thoughts — such an indolent man does not find the path to wisdom.

 

२८१.

वाचानुरक्खी मनसा सुसंवुतो, कायेन च नाकुसलं कयिरा [अकुसलं न कयिरा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]

एते तयो कम्मपथे विसोधये, आराधये मग्गमिसिप्पवेदितं॥

वाणी का अनुरक्षण करे ( सत्य और हितकर वचन बोले), मन से संयमित रहे, देह से अकुशल कर्म न करे, इन तीन कर्म-पथों की विशुद्धि से ही ऋषि (बुद्ध) द्वारा बताये गये मार्ग की आराधना होती है।

 

 

 

Let a man be watchful of speech, well controlled in mind, and not commit evil in bodily action. Let him purify these three courses of action, and win the path made known by the Great Sage.

 

२८२.

योगा वे जायती [जायते (कत्थचि)] भूरि, अयोगा भूरिसङ्खयो।

एतं द्वेधापथं ञत्वा, भवाय विभवाय च।

तथात्तानं निवेसेय्य, यथा भूरि पवड्ढति॥

योग (प्रयत्न) से भूरि (ज्ञान, विवेक) उत्पन्न होती है, अयोग (प्रयत्न न करने ) से भूरि में क्षय होता है। उन्नति और ह्रास के इन दो पथों को जानकर अपने आप को इस प्रकार रखना चाहिए ताकि ज्ञान/ विवेक में वृद्धि हो।

Wisdom springs from meditation; without meditation wisdom wanes. Having known these two paths of progress and decline, let a man so conduct himself that his wisdom may increase.

 

२८३.

वनं छिन्दथ मा रुक्खं, वनतो जायते भयं।

छेत्वा वनञ्‍च वनथञ्‍च, निब्बना होथ भिक्खवो॥

वृक्षों का वन नहीं, बल्कि तृष्णाओं के वन को काटो। तृष्णा के वन और झाड़ियों (मन में छिपी मूल तृष्णाओं) को काटने से ही, भिक्षुओ, निर्वाण प्राप्त होता है ।

Cut down the forest (lust), but not the tree; from the forest springs fear. Having cut down the forest and the underbrush (desire), be passionless, O monks! [20]

 

२८४.

याव हि वनथो न छिज्‍जति, अणुमत्तोपि नरस्स नारिसु।

पटिबद्धमनोव [पटिबन्धमनोव (क॰)] ताव सो, वच्छो खीरपकोव [खीरपानोव (पी॰)] मातरि॥

जबतक नर के मन में नारी के प्रति अणुमात्र कामना का भी झाड़ -झंकाड़ नहीं उखाड़ा जाता, तबतक जैसे दुधमुँहे बछड़े का अपनी माता से लगाव होता है वैसे ही उसका मन कामना से बँधा रहता है।

For so long as the underbrush of desire, even the most subtle, of a man towards a woman is not cut down, his mind is in bondage, like the sucking calf to its mother.

 

२८५.

उच्छिन्द सिनेहमत्तनो कुमुदं सारदिकंव [पाणिना]

सन्तिमग्गमेव ब्रूहय, निब्बानं सुगतेन देसितं॥

हाथ से शरद ऋतु के कुमुद को जैसे जड़ से उखाड़ते हैं, वैसे ही आत्मस्नेह को उखाड़ फेंको और सुगत (बुद्ध) द्वारा उपदिष्ट शान्ति पथ पर चलकर निर्वाण प्राप्त करो।

Cut off your affection in the manner of a man who plucks with his hand an autumn lotus. Cultivate only the path to peace, Nibbana, as made known by the Exalted One.

 

२८६.

इध वस्सं वसिस्सामि, इध हेमन्तगिम्हिसु।

इति बालो विचिन्तेति, अन्तरायं न बुज्झति॥

यहाँ मैं वर्षाकाल में रहूंगा, यहाँ मैं हेमंत और ग्रीष्म ऋतु में रहूंगा— ऐसा मूर्ख सोचते हैं। वह अन्तराय (विघ्न) नहीं समझता।

Here shall I live during the rains, here in winter and summer" — thus thinks the fool. He does not realize the danger (that death might intervene).

 

२८७.

तं पुत्तपसुसम्मत्तं, ब्यासत्तमनसं नरं।

सुत्तं गामं महोघोव, मच्‍चु आदाय गच्छति॥

जैसे सोए गाँव को बाढ़ बहा कर ले जाती है, वैसे ही पुत्र, पशु (धन) में आसक्त नर को मृत्यु ले जाती है।

. As a great flood carries away a sleeping village, so death seizes and carries away the man with a clinging mind, doting on his children and cattle.

 

२८८.

 सन्ति पुत्ता ताणाय, न पिता नापि बन्धवा।

अन्तकेनाधिपन्‍नस्स, नत्थि ञातीसु ताणता॥

मृत्यु के आधिपत्य से कोई बन्धु-बान्धव रक्षा नहीं करता- न पुत्र, न पिता, न भाई।

For him who is assailed by death there is no protection by kinsmen. None there are to save him — no sons, nor father, nor relatives.

 

२८९.

एतमत्थवसं ञत्वा, पण्डितो सीलसंवुतो।

निब्बानगमनं मग्गं, खिप्पमेव विसोधये॥

ऐसा समझकर बुद्धिमान व्यक्ति शील और संयम के साथ उस मार्ग की शीघ्रता से खोज करे जो निर्वाण तक जाता है ।

Realizing this fact, let the wise man, restrained by morality, hasten to clear the path leading to Nibbana.

 

English translation: “Maggavagga: The Path" (Dhp XX), translated from the Pali by Acharya Buddharakkhita. Access to Insight (BCBS Edition), 30 November 2013, http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.20.budd.html .

 

हिन्दी अनुवाद: राजीव