Thursday, January 3, 2013

पण्डितवग्गो



७६.
निधीनंव पवत्तारं, यं पस्से वज्‍जदस्सिनं।
निग्गय्हवादिं मेधाविं, तादिसं पण्डितं भजे।
तादिसं भजमानस्स, सेय्यो होति न पापियो॥

यदि कोई ऐसा मेधावी (प्रज्ञावन्त) मिले जो आपकी कमियों की ओर इशारा करे और आपको डाँटे, तो उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जानें जो किसी खजाने का रास्ता दिखाता है। ऐसे पण्डित की संगति में रहना चाहिए। यह संगति शुभकारक होती है, पापकारक नहीं।
Regard him as one who points out treasure, the wise one who seeing your faults rebukes you. Stay with this sort of sage. For the one who stays with a sage of this sort, things get better, not worse.

७७.
ओवदेय्यानुसासेय्य, असब्भा च निवारये।
सतञ्हि सो पियो होति, असतं होति अप्पियो॥

वह डाँटेगा, अनुशासित करेगा और अशोभनीय से दूर रखेगा। अच्छे लोगों के लिए वह प्रिय है, बुरे लोगों के लिए वह अप्रिय है।
Let him admonish, instruct, deflect you away from poor manners. To the good, he's endearing; to the bad, he's not.
७८.
न भजे पापके मित्ते, न भजे पुरिसाधमे।
भजेथ मित्ते कल्याणे, भजेथ पुरिसुत्तमे॥

बुरे मित्रों के साथ न रहें, नीच लोगों के साथ न रहें। कल्याण मित्र (ऐसा मित्र जो आपके कल्याण में सहायक हो) के साथ रहें, अच्छे लोगों के साथ रहें।
Don't associate with bad friends. Don't associate with the low. Associate with admirable friends. Associate with the best.
७९.
धम्मपीति सुखं सेति, विप्पसन्‍नेन चेतसा।
अरियप्पवेदिते धम्मे, सदा रमति पण्डितो॥

जो धर्मपान करता है (धर्म के अनुसार निरन्तर आचरण करता है) वह  निर्मल चित्त के साथ सुख से जीता है। पण्डित श्रेष्ठ जनों द्वारा प्रकाशित धर्म में सदा रमन करते हैं।
Drinking the Dhamma, refreshed by the Dhamma, one sleeps at ease with clear awareness & calm. In the Dhamma revealed by the noble ones, the wise person always delights.
८०.
उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति [दमयन्ति (क॰)] तेजनं।
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति पण्डिता॥

मेँड़ बनाने वाले पानी को दिशा देते हैं, बाण बनाने वाले   बाण को आकार देते हैं, बढ़ई लकड़ी को आकार देते हैं, पण्डित ( अपने आपको आकार देते हैं), अपने आप पर ही नियंत्रण रखते हैं।
Irrigators guide the water. Fletchers shape the arrow shaft. Carpenters shape the wood. The wise control themselves.
८१.
सेलो यथा एकघनो [एकग्घनो (क॰)], वातेन न समीरति।
एवं निन्दापसंसासु, न समिञ्‍जन्ति पण्डिता॥

जैसे एक ठोस चट्टान हवा से नहीं हिलायी जा सकती, वैसे ही पण्डित निन्दा-प्रशंसा से विचलित नहीं होते।  
As a single slab of rock won't budge in the wind, so the wise are not moved by praise, by blame.
८२.
 
यथापि रहदो गम्भीरो, विप्पसन्‍नो अनाविलो।
एवं धम्मानि सुत्वान, विप्पसीदन्ति पण्डिता॥

जैसे एक गहरी झील निर्मल और शान्त होती है, वैसे ही धर्म सुनकर पण्डित शान्त हो जाते हैं। 
Like a deep lake, clear, unruffled, & calm: so the wise become clear, calm, on hearing words of the Dhamma.
८३.
सब्बत्थ वे सप्पुरिसा चजन्ति, न कामकामा लपयन्ति सन्तो।
सुखेन फुट्ठा अथ वा दुखेन, न उच्‍चावचं [नोच्‍चावचं (सी॰ अट्ठ॰)] पण्डिता दस्सयन्ति॥

सद्पुरुष सभी चीजों का त्याग करते हैं, वे किसी सुख के लिए लालायित नहीं रहते, सुख अथवा दुख के स्पर्श से वे अत्यन्त प्रफुल्लित या विषन्न नहीं होते।
Everywhere, truly, those of integrity stand apart. They, the good, don't chatter in hopes of favor or gains. When touched now by pleasure, now pain, the wise give no sign of high or low.
८४.
न अत्तहेतु न परस्स हेतु, न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं।
न इच्छेय्य [नयिच्छे (पी॰), निच्छे (?)] अधम्मेन समिद्धिमत्तनो, स सीलवा पञ्‍ञवा धम्मिको सिया॥

जो न अपने खातिर और न दूसरे के खातिर पुत्र या धन या राज्य की इच्छा करता है, जो अधर्म के मार्ग से अपनी समृद्धि नहीं चाहता वही शीलवान, प्रज्ञावान और धार्मिक है। 
one who wouldn't — not for his own sake nor that of another — hanker for wealth, a son, a kingdom, his own fulfillment, by unrighteous means: he is righteous, rich in virtue, discernment.
८५.
अप्पका ते मनुस्सेसु, ये जना पारगामिनो।
अथायं इतरा पजा, तीरमेवानुधावति॥

मनुष्यों में ऐसे लोग कम हैं जो इस संसार रूपी नदी के पार जाते हैं ( जो मुक्ति पाते हैं)। शेष जनसमुदाय किनारे पर  ही इधर से उधर दौड़ता रहता है। 
Few are the people who reach the Far Shore. These others simply scurry along this shore.
८६.
ये च खो सम्मदक्खाते, धम्मे धम्मानुवत्तिनो।
ते जना पारमेस्सन्ति, मच्‍चुधेय्यं सुदुत्तरं॥

जो अच्छी तरह से कहे गये इस धर्म का अनुसरण करते हैं, वे इस दुस्तर मृत्युलोक को पार करते हैं।
But those who practice Dhamma in line with the well-taught Dhamma, will cross over the realm of Death so hard to transcend.
८७.
कण्हं धम्मं विप्पहाय, सुक्‍कं भावेथ पण्डितो।
ओका अनोकमागम्म, विवेके यत्थ दूरमं॥


पण्डित को कृष्ण धर्म  छोड़कर शुक्ल धर्म  विकसित करना चाहिए। उसे घर से बेघर होकर विवेक ( अनासक्ति, विराग, एकान्त) में रमना चाहिए, जो अत्यंत कठिन है। 
 Forsaking dark practices, the wise person should develop the bright, having gone from home to no-home in seclusion, so hard to enjoy.
८८.
तत्राभिरतिमिच्छेय्य, हित्वा कामे अकिञ्‍चनो।
परियोदपेय्य [परियोदापेय्य (?)] अत्तानं, चित्तक्‍लेसेहि पण्डितो॥

उस अकिंचन को कामभाव छोड़कर उस एकान्त में सुख खोजने की इच्छा रखनी चाहिए। पण्डित को अपने चित्त को विकारों से मुक्त करना चाहिए। 
There he should wish for delight, discarding sensuality — he who has nothing. He should cleanse himself — wise — of what defiles the mind.
८९.
येसं सम्बोधियङ्गेसु, सम्मा चित्तं सुभावितं।
आदानपटिनिस्सग्गे, अनुपादाय ये रता।
खीणासवा जुतिमन्तो, ते लोके परिनिब्बुता॥

जिनका चित्त सम्बोधि के अंगों को अच्छी तरह विकसित कर चुका है, जो विराग और अनासक्ति में रत हैं, जिनके विकार क्षीण हो गये हैं, ऐसे ज्योतिमन्त लोग इस लोक में विमुक्त हैं।
Whose minds are well-developed in the factors of self-awakening, who delight in non-clinging, relinquishing grasping — resplendent, their effluents ended: they, in the world, are Unbound.
पण्डितवग्गो छट्ठो निट्ठितो

Tuesday, January 1, 2013

बालवग्गो



६०.
दीघा जागरतो रत्ति, दीघं सन्तस्स योजनं।
दीघो बालानं संसारो, सद्धम्मं अविजानतं॥

जगे हुए के लिए रात लम्बी है, थके हुए के लिए योजन लम्बा है, जो सद्धर्म नहीं जानते उनके लिए संसार लम्बा है।
Long for the wakeful is the night. Long for the weary, a league. For fools unaware of True Dhamma, samsara is long.
६१.
चरञ्‍चे नाधिगच्छेय्य, सेय्यं सदिसमत्तनो।
एकचरियं [एकचरियं (क॰)] दळ्हं कयिरा, नत्थि बाले सहायता॥

इस जीवन यात्रा के दौरान तुमसे श्रेष्ठ या तुम्हारे समान संगी न मिले तो दृढ़ निश्चय  होकर अकेले चलो। मूर्खों का साथ ठीक नहीं।
If, in your course, you don't meet your equal, your better, then continue your course, firmly, alone. There's no fellowship with fools.
६२.
पुत्ता मत्थि धनम्मत्थि [पुत्तमत्थि धनमत्थि (क॰)], इति बालो विहञ्‍ञति।
अत्ता हि [अत्तापि (?)] अत्तनो नत्थि, कुतो पुत्ता कुतो धनं॥

मूर्ख सोचता है -यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है। जब उसका अपना आत्म (स्व) ही अपना नहीं है, तो कहां पुत्र और कहां धन! 

'I have sons, I have wealth' — the fool torments himself. When even he himself doesn't belong to himself, how then sons? How wealth?
६३.
यो बालो मञ्‍ञति बाल्यं, पण्डितो वापि तेन सो।
बालो च पण्डितमानी, स वे ‘‘बालो’’ति वुच्‍चति॥

जो मूर्ख अपनी मूर्खता जानता है, वह अपने इस ज्ञान के कारण पण्डित है। जो मूर्ख अपने आपको पण्डित मानता है, उसे ही मूर्ख कहा जाता है।
A fool with a sense of his foolishness is — at least to that extent — wise. But a fool who thinks himself wise really deserves to be called a fool.
६४.
यावजीवम्पि चे बालो, पण्डितं पयिरुपासति।
न सो धम्मं विजानाति, दब्बी सूपरसं यथा॥

आजीवन पण्डित के पास रहने पर भी मूर्ख धर्म नहीं जानता, जैसे चमचे को सूप का स्वाद मालूम नहीं होता।
Even if for a lifetime the fool stays with the wise, he knows nothing of the Dhamma — as the ladle, the taste of the soup.
६५.
मुहुत्तमपि चे विञ्‍ञू, पण्डितं पयिरुपासति।
खिप्पं धम्मं विजानाति, जिव्हा सूपरसं यथा॥

बुद्धिमान व्यक्ति मुहूर्त भर भी पण्डित के पास रहे तो वह तुरंत धर्म जानता है, जैसे जीभ पल भर में सूप का स्वाद समझती है।
Even if for a moment, the perceptive person stays with the wise, he immediately knows the Dhamma — as the tongue, the taste of the soup.
६६.
चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमित्तेनेव अत्तना।
करोन्ता पापकं कम्मं, यं होति कटुकप्फलं॥

मूर्ख, बुद्धिहीन लोग स्वयं अपने दुश्मन हैं। वे पापकर्म करते हुए जीते हैं, जिनका फल कटु होता है।
Fools, their wisdom weak, are their own enemies as they go through life, doing evil that bears bitter fruit.
६७.
न तं कम्मं कतं साधु, यं कत्वा अनुतप्पति।
यस्स अस्सुमुखो रोदं, विपाकं पटिसेवति॥

उस कर्म को करना अच्छा नहीं है, जिसे करके आदमी पछताता है, जिसके फल का सेवन  आदमी अश्रुमुख होकर रोते हुए करता है।
It's not good, the doing of the deed that, once it's done, you regret, whose result you reap crying, your face in tears.

६८.
तञ्‍च कम्मं कतं साधु, यं कत्वा नानुतप्पति।
यस्स पतीतो सुमनो, विपाकं पटिसेवति॥

उस कर्म को करना अच्छा  है, जिसे करके आदमी पछताता नहीं है, जिसके फल का सेवन आदमी अच्छे मन से करता है।
It's good, the doing of the deed that, once it's done, you don't regret, whose result you reap gratified, happy at heart.
६९.
मधुवा [मधुं वा (दी॰ नि॰ टीका १)] मञ्‍ञति बालो, याव पापं न पच्‍चति।
यदा च पच्‍चति पापं, बालो [अथ बालो (सी॰ स्या॰) अथ (?)] दुक्खं निगच्छति॥

जब तक पाप का फल नहीं मिलता तबतक मूर्ख उसे मधु समझता है, जब पाप का फल मिलता है तो मूर्ख दुखी होता है।
As long as evil has yet to ripen, the fool mistakes it for honey. But when that evil ripens, the fool falls into pain.
७०.
मासे मासे कुसग्गेन, बालो भुञ्‍जेय्य भोजनं।
न सो सङ्खातधम्मानं [सङ्खतधम्मानं (सी॰ पी॰ क॰)], कलं अग्घति सोळसिं॥

महीनों तक कुशाग्र के बराबर भोजन करने पर भी मूर्ख किसी  धर्मज्ञ के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं माना जाएगा।
Month after month the fool might eat only a tip-of-grass measure of food, but he wouldn't be worth one sixteenth of those who've fathomed the Dhamma.
७१.
न हि पापं कतं कम्मं, सज्‍जु खीरंव मुच्‍चति।
डहन्तं बालमन्वेति, भस्मच्छन्‍नोव [भस्माछन्‍नोव (सी॰ पी॰ क॰)] पावको॥


जैसे दूध तुरंत दही नहीं बन जाता, वेसे ही पाप कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता है। भस्म में ढँके आग की तरह पापकर्म मूर्ख का पीछा करता है और उसे जलाता है। 
An evil deed, when done, doesn't — like ready milk — come out right away. It follows the fool, smoldering like a fire hidden in ashes.
७२.
यावदेव अनत्थाय, ञत्तं [ञातं (?)] बालस्स जायति।
हन्ति बालस्स सुक्‍कंसं, मुद्धमस्स विपातयं॥

मूर्ख द्वारा प्राप्त यश भी उसके अनर्थ के लिए होता है- वह उसकी बची हुई अच्छाई को नष्ट करता है।
Only for his ruin does renown come to the fool. It ravages his bright fortune & rips his head apart.
७३.
असन्तं भावनमिच्छेय्य [असन्तं भावमिच्छेय्य (स्या॰), असन्तभावनमिच्छेय्य (क॰)], पुरेक्खारञ्‍च भिक्खुसु।
आवासेसु च इस्सरियं, पूजा परकुलेसु च॥

वह ऐसी प्रतिष्ठा चाहता है, जिसका वह हकदार नहीं है। वह भिक्षुओं में सर्वोपरि स्थान , मठों में स्वामित्व और गृहस्थों में अपनी पूजा चाहता है।
He would want unwarranted status, preeminence among monks, authority among monasteries, homage from lay families.

७४.
ममेव कत मञ्‍ञन्तु, गिहीपब्बजिता उभो।
ममेवातिवसा अस्सु, किच्‍चाकिच्‍चेसु किस्मिचि।
इति बालस्स सङ्कप्पो, इच्छा मानो च वड्ढति॥

'गृही और परिव्राजक, दोनों यह समझें कि यह मेरे द्वारा ही सम्पन्न हुआ है। छोटे बड़े सभी कार्यों में मेरा ही अनुसरण हो।' यही मूर्ख का संकल्प रहता है और इस प्रकार उसकी इच्छा और अहंकार बढ़ता जाता है।
Let householders & those gone forth both think that this was done by me alone. May I alone determine what's a duty, what's not': the resolve of a fool as they grow — his desire & pride.
७५.
अञ्‍ञा हि लाभूपनिसा, अञ्‍ञा निब्बानगामिनी।
एवमेतं अभिञ्‍ञाय, भिक्खु बुद्धस्स सावको।
सक्‍कारं नाभिनन्देय्य, विवेकमनुब्रूहये॥

लाभ का रास्ता अलग है और निर्वाण का रास्ता अलग। इसे अच्छी तरह समझकर बुद्ध के शिष्य, भिक्खु को सत्कार का स्वागत नहीं करना चाहिए, विवेक (अनासक्ति, विराग) की खोज में लगे रहना चाहिए।
The path to material gain goes one way, the way to Unbinding, another. Realizing this, the monk, a disciple to the Awakened One, should not relish offerings, should cultivate seclusion instead.
बालवग्गो पञ्‍चमो निट्ठितो।

"Balavagga: Fools" (Dhp V), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी अनुवाद: राजीव

पुप्फवग्गो



४४.
को इमं [कोमं (क॰)] पथविं विचेस्सति [विजेस्सति (सी॰ स्या॰ पी॰)], यमलोकञ्‍च इमं सदेवकं।
को धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति [पुप्फमिवप्पचेस्सति (क॰)]
इस पृथ्वी, यमलोक और देवलोक को कौन समझेगा? कौन इस सुआख्यायित ( अच्छी तरह से समझाए गये) धर्म के मर्म को समझेगा, जैसे कुशल मालाकार फूलों को समझता है? 
Who will penetrate this earth & this realm of death with all its gods? Who will ferret out the well-taught Dhamma-saying, as the skillful flower-arranger the flower?


४५.
सेखो पथविं विचेस्सति, यमलोकञ्‍च इमं सदेवकं।
सेखो धम्मपदं सुदेसितं, कुसलो पुप्फमिव पचेस्सति॥

इस पृथ्वी, यमलोक और देवलोक को वह समझेगा, जो सीखता है।सीखने वाला ही इस सुआख्यायित ( अच्छी तरह से समझाए गये) धर्म के मर्म को समझेगा, जैसे कुशल मालाकार फूलों को समझता है। 
The learner-on-the-path will penetrate this earth & this realm of death with all its gods. The learner-on-the-path will ferret out the well-taught Dhamma-saying, as the skillful flower-arranger the flower.


४६.
फेणूपमं कायमिमं विदित्वा, मरीचिधम्मं अभिसम्बुधानो।
छेत्वान मारस्स पपुप्फकानि [सपुप्फकानि (टीका)], अदस्सनं मच्‍चुराजस्स गच्छे॥

इस काया को फेण (बुलबुले) के समान जानकर, इस अस्तित्व को मरीचिका (मृगतृष्णा) समझकर,  मार के पुष्पवाणों को काटकर तुम वहां जाओ जो यमदेवता की नजरों से दूर है।
Knowing this body is like foam, realizing its nature — a mirage — cutting out the blossoms of Mara, you go where the King of Death can't see.


४७.
पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं [ब्यासत्तमानसं (क॰)] नरं।
सुत्तं गामं महोघोव, मच्‍चु आदाय गच्छति॥
जिस व्यक्ति का मन फूल चुनने ( सुख खोजने) में विशेष रूप से आसक्त है, उसे मृत्यु वैसे ही ले जाती है, जैसे सोए हुए गाँव को भीषण बाढ़।
The man immersed in gathering blossoms, his heart distracted: death sweeps him away — as a great flood, a village asleep.
४८.
पुप्फानि हेव पचिनन्तं, ब्यासत्तमनसं नरं।
अतित्तञ्‍ञेव कामेसु, अन्तको कुरुते वसं॥

जिस व्यक्ति का मन फूल चुनने ( सुख खोजने) में विशेष रूप से आसक्त है, ऐसी अतृप्त इच्छा वाले व्यक्ति को मृत्यु अपने वश में कर लेती है।
The man immersed in gathering blossoms, his heart distracted, insatiable in sensual pleasures: the End-Maker holds him under his sway.
४९.
यथापि भमरो पुप्फं, वण्णगन्धमहेठयं [वण्णगन्धमपोठयं (क॰)]
पलेति रसमादाय, एवं गामे मुनी चरे॥

जैसे भ्रमर फूल के वर्ण और गन्ध को नुकसान पहुँचाये बिना रस ग्रहण कर  उड़ जाता है, वैसे ही मुनि गाँव में जाए।
As a bee — without harming the blossom, its color, its fragrance — takes its nectar & flies away: so should the sage go through a village.
५०.
न परेसं विलोमानि, न परेसं कताकतं।
अत्तनोव अवेक्खेय्य, कतानि अकतानि च॥


आदमी न दूसरों के दोष देखे, न दूसरों का कृत अकृत देखे। उसे अपना ही कृत अकृत  देखना चाहिए।
Focus, not on the rudenesses of others, not on what they've done or left undone, but on what you have & haven't done yourself.
५१.
यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं अगन्धकं।
एवं सुभासिता वाचा, अफला होति अकुब्बतो॥

जैसे आकर्षक रंग वाला फूल गंधहीन हो, वैसे ही सुभाषित (अच्छी तरह बोला गया) वचन भी निष्फल है यदि उसके अनुसार कर्म न किया गया हो।
Just like a blossom, bright colored but scentless: a well-spoken word is fruitless when not carried out.
५२.
यथापि रुचिरं पुप्फं, वण्णवन्तं सुगन्धकं [सगन्धकं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
एवं सुभासिता वाचा, सफला होति कुब्बतो [सकुब्बतो (सी॰ पी॰), पकुब्बतो (सी॰ अट्ठ॰), सुकुब्बतो (स्या॰ कं॰)]

जैसे आकर्षक रंग वाला फूल सुगंधित भी हो, वैसे ही सुभाषित (अच्छी तरह बोला गया) वचन सफल होता है यदि उसके अनुसार कर्म किया गया हो।

Just like a blossom, bright colored & full of scent: a well-spoken word is fruitful when well carried out.
५३.
यथापि पुप्फरासिम्हा, कयिरा मालागुणे बहू।
एवं जातेन मच्‍चेन, कत्तब्बं कुसलं बहुं॥

जैसे पुष्पराशियों ( फूलों की ढेर) में से अनेक मालाएँ गुँथी जा सकती हैं, वैसे ही मरणशील मानव को जन्म लेने के बाद अनेक अच्छे कर्म करने चाहिए।
Just as from a heap of flowers many garland strands can be made, even so one born & mortal should do — with what's born & is mortal — many a skillful thing.
५४.
न पुप्फगन्धो पटिवातमेति, न चन्दनं तगरमल्‍लिका [तगरमल्‍लिका (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
सतञ्‍च गन्धो पटिवातमेति, सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति॥


फूल, चन्दन, तगर, मल्लिका की गंध हवा की विपरीत दिशा में नहीं जाती। अच्छाई की सुगंध हवा के विरुद्ध जाती है। सद्पुरुष के गुण सभी दिशाओं में प्रवाहित होते हैं।



No flower's scent goes against the wind — not sandalwood, jasmine, tagara. But the scent of the good does go against the wind. The person of integrity wafts a scent in every direction

५५.
चन्दनं तगरं वापि, उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं, सीलगन्धो अनुत्तरो॥

चन्दन, तगर, नील कमल, चमेली - इन सभी सुगन्धों से बढ़कर शील (गुणौं) की सुगन्ध है।

Sandalwood, tagara, lotus, & jasmine: Among these scents, the scent of virtue is unsurpassed.



५६.
अप्पमत्तो अयं गन्धो, य्वायं तगरचन्दनं [यायं तगरचन्दनी (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]
यो च सीलवतं गन्धो, वाति देवेसु उत्तमो॥

तगर और चन्दन की यह गंध सीमित है, लेकिन शीलवान पुरुष की गंध उत्तम है - वह देवताओं तक पहुँचती है।
Next to nothing, this fragrance — sandalwood, tagara — while the scent of the virtuous wafts to the gods, supreme.
५७.
तेसं सम्पन्‍नसीलानं, अप्पमादविहारिनं।
सम्मदञ्‍ञा विमुत्तानं, मारो मग्गं न विन्दति॥

उस शीलसंपन्न , अप्रमादविहारी ( जो हमेशा अप्रमादपूर्वक जीता है), सम्यक ज्ञान के कारण विमुक्त हुए व्यक्ति के पथ को मार नहीं पहचानता।
Those consummate in virtue, dwelling in heedfulness, released through right knowing: Mara can't follow their tracks.
५८.
यथा सङ्कारठानस्मिं [सङ्कारधानस्मिं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)], उज्झितस्मिं महापथे।
पदुमं तत्थ जायेथ, सुचिगन्धं मनोरमं॥

जैसे राजमार्ग के किनारे फेंके गये कूड़े की ढेर में एक पवित्र गंध वाला मनोरम कमल खिल सकता है;

As in a pile of rubbish cast by the side of a highway a lotus might grow clean-smelling pleasing the heart,

५९.
एवं सङ्कारभूतेसु, अन्धभूते [अन्धीभूते (क॰)] पुथुज्‍जने।
अतिरोचति पञ्‍ञाय, सम्मासम्बुद्धसावको॥

उसी प्रकार सम्यक सम्बुद्ध (बुद्ध) का श्रावक (शिष्य) अति साधारण दृष्टिहीन जनों के बीच अपनी प्रज्ञा के कारण शोभा पाता है।



so in the midst of the rubbish-like, people run-of-the-mill & blind, there dazzles with discernment the disciple of the Rightly Self-Awakened One.
पुप्फवग्गो चतुत्थो निट्ठितो।