Wednesday, December 19, 2012

चित्तवग्गो


३३.
फन्दनं चपलं चित्तं, दूरक्खं [दुरक्खं (सब्बत्थ)] दुन्‍निवारयं।
उजुं करोति मेधावी, उसुकारोव तेजनं॥
यह चित्त निरन्तर स्पन्दनशील और चंचल है। इसकी रक्षा और इसको वश में रखना कठिन है।मेधावी पुरुष ऐसे मन को सरल बनाता है, ठीक वैसे ही जैसे तीरन्दाज अपने वाणों को सीधा  बनाता है।
Quivering, wavering, hard to guard, to hold in check: the mind. The sage makes it straight — like a fletcher, the shaft of an arrow.

३४.

वारिजोव थले खित्तो, ओकमोकतउब्भतो।

परिफन्दतिदं चित्तं, मारधेय्यं पहातवे॥

मार के चंगुल से छूटने के लिए प्रयास करते समय यह चित्त उसी तरह छटपटाता है जैसे पानी से निकालकर धरती पर फेंकी हुई मछली छटपटाती है।


Like a fish pulled from its home in the water & thrown on land: this mind flips & flaps about to escape Mara's sway.
३५.
दुन्‍निग्गहस्स लहुनो, यत्थकामनिपातिनो।
चित्तस्स दमथो साधु, चित्तं दन्तं सुखावहं॥

यह चंचल चित्त, जिसका निग्रह कठिन है और जो जहाँ चाहे वहाँ चला जाता है- ऐसे चित्त का दमन अच्छा है। दमित चित्त सुख लाता है। 
Hard to hold down, nimble, alighting wherever it likes: the mind. Its taming is good. The mind well-tamed brings ease.
३६.
सुदुद्दसं सुनिपुणं, यत्थकामनिपातिनं।
चित्तं रक्खेथ मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं॥

इस चित्त को देखना अत्यन्त कठिन है, यह अत्यन्त निपुण है, जहाँ चाहता है वहाँ ठहरता है। मेधावी ऐसे चित्त की रक्षा करते हैं। रक्षित चित्त सुख लाता है।
So hard to see, so very, very subtle, alighting wherever it likes: the mind. The wise should guard it. The mind protected brings ease.
३७.
दूरङ्गमं एकचरं [एकचारं (क॰)], असरीरं गुहासयं।
ये चित्तं संयमेस्सन्ति, मोक्खन्ति मारबन्धना॥

यह चित्त दूर-दूर जाता है, अकेला विचरण करता है, अशरीरी है, दूसरे की नजरों से छुपा (गुहा में) रहता है। जो इस चित्त को संयमित करते हैं, वे मार के बन्धन से छूट जाते हैं।
Wandering far, going alone, bodiless, lying in a cave: the mind. Those who restrain it: from Mara's bonds they'll be freed.
३८.
अनवट्ठितचित्तस्स, सद्धम्मं अविजानतो।
परिप्‍लवपसादस्स, पञ्‍ञा न परिपूरति॥

जिसका चित्त अनवस्थित (अस्थिर) है, वह सच्चा धर्म नहीं जानता, उसके चित्त की शान्ति घट जाती है और उसमें प्रज्ञा का पूर्ण उदय नहीं होता।
For a person of unsteady mind, not knowing true Dhamma, serenity set adrift: discernment doesn't grow full.
३९.
अनवस्सुतचित्तस्स, अनन्वाहतचेतसो।
पुञ्‍ञपापपहीनस्स, नत्थि जागरतो भयं॥

जिसका चित्त वासनाग्रस्त नहीं है, जिसकी चेतना विकारग्रस्त नहीं है, वह पाप और पुण्य से ऊपर उठ जाता है। जो जाग्रत है उसके लिए कोई भय नहीं है।
For a person of unsoddened mind, unassaulted awareness, abandoning merit & evil, wakeful, there is no danger no fear.
४०.
कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा, नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा।
योधेथ मारं पञ्‍ञावुधेन, जितञ्‍च रक्खे अनिवेसनो सिया॥

इस काया को मिट्टी के घड़े के समान जानकर चित्त को नगर के समान रक्षा करने के लिए प्रज्ञा के अस्त्र से मार का मुकाबला करो और इस तरह बचाये हुए चित्त में अनिवासी की तरह रहो।
Knowing this body is like a clay jar, securing this mind like a fort, attack Mara with the spear of discernment, then guard what's won without settling there, without laying claim.
४१.
अचिरं वतयं कायो, पथविं अधिसेस्सति।
छुद्धो अपेतविञ्‍ञाणो, निरत्थंव कलिङ्गरं॥

शीघ्र ही यह काया धरती पर चेतनाहीन होकर लकड़ी के क्षुद्र टुकड़े की तरह पड़ी होगी।
All too soon, this body will lie on the ground cast off, bereft of consciousness, like a useless scrap of wood.
४२.
दिसो दिसं यं तं कयिरा, वेरी वा पन वेरिनं।
मिच्छापणिहितं चित्तं, पापियो [पापियं (?)] नं ततो करे॥

एक लुटेरा दूसरे लुटेरे को , एक वैरी दूसरे वैरी को जितना नुकसान पहुँचा सकता है, गलत दिशा की ओर मुड़ा हुआ आपका चित्त आपको उससे भी अधिक नुकसान पहुँचाता है।
Whatever an enemy might do to an enemy, or a foe to a foe, the ill-directed mind can do to you even worse.
४३.
न तं माता पिता कयिरा, अञ्‍ञे वापि च ञातका।
सम्मापणिहितं चित्तं, सेय्यसो नं ततो करे॥

न माता, न पिता और न अन्य नातेदार ही आपका उतना भला करते हैं, जितना एक सम्यक दिशा की ओर मुड़ा हुआ चित्त।
Whatever a mother, father or other kinsman might do for you, the well-directed mind can do for you even better.
चित्तवग्गो ततियो निट्ठितो।

"Cittavagga: The Mind" (Dhp III), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी ानुवाद :राजीव

Friday, December 14, 2012

अप्पमादवग्गो



२१.
अप्पमादो अमतपदं [अमतं पदं (क॰)], पमादो मच्‍चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥

अप्रमाद (हमेशा होश में रहना, जागरूक रहना, गलती न करना) अमरत्व का पथ है। प्रमाद मृत्यु का पथ है। जो अप्रमत्त हैं, वे नहीं मरते। जो प्रमत्त हैं. वे मृत समान हैं।
Heedfulness: the path to the Deathless. Heedlessness: the path to death. The heedful do not die. The heedless are as if already dead.
२२.
एवं [एतं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] विसेसतो ञत्वा, अप्पमादम्हि पण्डिता।
अप्पमादे पमोदन्ति, अरियानं गोचरे रता॥

जो ज्ञानी हैं वे इस अप्रमाद के महत्व को विशेष रूप से समझते हुए अप्रमाद
में ही प्रसन्न रहते हैं। यही श्रेष्ठ जनों की मनोभूमि है- जिसमें वे निमग्न रहते हैं।
Knowing this as a true distinction,
those wise in heedfulness
rejoice in heedfulness,
enjoying the range of the noble ones.

२३.
ते झायिनो साततिका, निच्‍चं दळ्हपरक्‍कमा।
फुसन्ति धीरा निब्बानं, योगक्खेमं अनुत्तरं॥

धीर व्यक्ति  दृढ़ पराक्रम के साथ नित्य निरन्तर ध्यान में रहते हुए निर्वाण का स्पर्श करते हैं जो एक अनुत्तर (अनुपम) मुक्ति की स्थिति है। 
The enlightened, constantly absorbed in jhana, persevering, firm in their effort: they touch Unbinding, the unexcelled rest from the yoke.

२४.
उट्ठानवतो सतीमतो [सतिमतो (सी॰ स्या॰ क॰)], सुचिकम्मस्स निसम्मकारिनो।
सञ्‍ञतस्स धम्मजीविनो, अप्पमत्तस्स [अपमत्तस्स (?)] यसोभिवड्ढति॥

जो प्रगति की ओर अभिमुख हैं, जो जागरूक हैं, जिनके कर्म पवित्र हैं, जो सभी कर्म विचार पूर्वक करते हैं, जो संयत हैं, जो धर्म का जीवन जीते हैं और जो अप्रमत्त हैं, उनके यश में अभिवृद्धि होती है।

Those with initiative, mindful, clean in action, acting with due consideration, heedful, restrained, living the Dhamma: their glory grows.
२५.
उट्ठानेनप्पमादेन , संयमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरति॥

उत्साह और लगन से, अप्रमाद से, संयम और नियंत्रण से मेधावी व्यक्ति एक द्वीप बनाते हैं जिसे (विकारों का) कोई सैलाब नहीं डुबा सकता। 
Through initiative, heedfulness, restraint, & self-control, the wise would make an island no flood can submerge.
२६.
पमादमनुयुञ्‍जन्ति, बाला दुम्मेधिनो जना।
अप्पमादञ्‍च मेधावी, धनं सेट्ठंव रक्खति॥

मूर्ख और मंदबुद्धि प्रमाद में रत रहते हैं, जबकि मेधावी अप्रमाद की रक्षा श्रेष्ठ धन के रूप में करते हैं। 
They're addicted to heedlessness — dullards, fools — while one who is wise cherishes heedfulness as his highest wealth.
२७.
मा पमादमनुयुञ्‍जेथ, मा कामरतिसन्थवं [सन्धवं (क)]
अप्पमत्तो हि झायन्तो, पप्पोति विपुलं सुखं॥

प्रमाद में रत मत रहो। काम सुख से सन्धि मत करो। जो अप्रमत्त हैं, वे ध्यानस्थ होकर विपुल सुख प्राप्त करते हैं।
Don't give way to heedlessness or to intimacy with sensual delight — for a heedful person, absorbed in jhana, attains an abundance of ease.
२८.
पमादं अप्पमादेन, यदा नुदति पण्डितो।
पञ्‍ञापासादमारुय्ह, असोको सोकिनिं पजं।
पब्बतट्ठोव भूमट्ठे [भुम्मट्ठे (सी॰ स्या॰)], धीरो बाले अवेक्खति॥

जब ज्ञानी अप्रमाद से प्रमाद को दूर भगाता है, तब प्रज्ञा के ऊँचे भवन में आरोहण कर शोक मुक्त होकर दु:खी समुदाय को इस प्रकार देखता है जैसे कोई धीर पुरुष पर्वत की ऊँचाई पर पहुँच कर नीचे छूट गई भीड़ को देखता है।
When the wise person drives out heedlessness with heedfulness, having climbed the high tower of discernment, sorrow-free, he observes the sorrowing crowd — as the enlightened man, having scaled a summit, the fools on the ground below.
२९.
अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।
अबलस्संव सीघस्सो, हित्वा याति सुमेधसो॥

बुद्धिमान व्यक्ति प्रमत्तों के बीच अप्रमत्त होकर, निद्रानिमग्न लोगों के बीच अत्यंत जाग्रत होकर जीता है, ठीक वैसे ही जैसे दुर्बल अश्वों को पीछे छोड़कर तेज गति से दौड़नेवाला अश्व आगे निकल जाता है।
Heedful among the heedless, wakeful among those asleep, just as a fast horse advances, leaving the weak behind: so the wise.
३०.
अप्पमादेन मघवा, देवानं सेट्ठतं गतो।
अप्पमादं पसंसन्ति, पमादो गरहितो सदा॥

अप्रमाद के कारण इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना। हमेशा अप्रमाद की बड़ाई की जाती है, जबकि प्रमाद को गर्हित माना जाता है।
Through heedfulness, Indra won to lordship over the gods. Heedfulness is praised, heedlessness censured — always.

३१.
अप्पमादरतो भिक्खु, पमादे भयदस्सि वा।
संयोजनं अणुं थूलं, डहं अग्गीव गच्छति॥

जो भिक्षु अप्रमाद में रत रहकर प्रमाद से डरते हैं, वह अग्नि के  समान छोटे-बड़े बंधनों को जलाते हुए आगे बढ़ते हैं।
The monk delighting in heedfulness, seeing danger in heedlessness, advances like a fire, burning fetters great & small.
३२.
अप्पमादरतो भिक्खु, पमादे भयदस्सि वा।
अभब्बो परिहानाय, निब्बानस्सेव सन्तिके॥

जो भिक्षु अप्रमाद में रत रहकर प्रमाद से डरते हैं, वे प्राप्त ऊँचाई से नीचे नहीं गिरते। वे निर्वाण के अत्यंत निकट हैं।


The monk delighting in heedfulness, seeing danger in heedlessness — incapable of falling back — stands right on the verge of Unbinding.
अप्पमादवग्गो दुतियो निट्ठितो।
"Appamadavagga: Heedfulness" (Dhp II), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी अनुवाद:राजीव