Wednesday, December 19, 2012

चित्तवग्गो


३३.
फन्दनं चपलं चित्तं, दूरक्खं [दुरक्खं (सब्बत्थ)] दुन्‍निवारयं।
उजुं करोति मेधावी, उसुकारोव तेजनं॥
यह चित्त निरन्तर स्पन्दनशील और चंचल है। इसकी रक्षा और इसको वश में रखना कठिन है।मेधावी पुरुष ऐसे मन को सरल बनाता है, ठीक वैसे ही जैसे तीरन्दाज अपने वाणों को सीधा  बनाता है।
Quivering, wavering, hard to guard, to hold in check: the mind. The sage makes it straight — like a fletcher, the shaft of an arrow.

३४.

वारिजोव थले खित्तो, ओकमोकतउब्भतो।

परिफन्दतिदं चित्तं, मारधेय्यं पहातवे॥

मार के चंगुल से छूटने के लिए प्रयास करते समय यह चित्त उसी तरह छटपटाता है जैसे पानी से निकालकर धरती पर फेंकी हुई मछली छटपटाती है।


Like a fish pulled from its home in the water & thrown on land: this mind flips & flaps about to escape Mara's sway.
३५.
दुन्‍निग्गहस्स लहुनो, यत्थकामनिपातिनो।
चित्तस्स दमथो साधु, चित्तं दन्तं सुखावहं॥

यह चंचल चित्त, जिसका निग्रह कठिन है और जो जहाँ चाहे वहाँ चला जाता है- ऐसे चित्त का दमन अच्छा है। दमित चित्त सुख लाता है। 
Hard to hold down, nimble, alighting wherever it likes: the mind. Its taming is good. The mind well-tamed brings ease.
३६.
सुदुद्दसं सुनिपुणं, यत्थकामनिपातिनं।
चित्तं रक्खेथ मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं॥

इस चित्त को देखना अत्यन्त कठिन है, यह अत्यन्त निपुण है, जहाँ चाहता है वहाँ ठहरता है। मेधावी ऐसे चित्त की रक्षा करते हैं। रक्षित चित्त सुख लाता है।
So hard to see, so very, very subtle, alighting wherever it likes: the mind. The wise should guard it. The mind protected brings ease.
३७.
दूरङ्गमं एकचरं [एकचारं (क॰)], असरीरं गुहासयं।
ये चित्तं संयमेस्सन्ति, मोक्खन्ति मारबन्धना॥

यह चित्त दूर-दूर जाता है, अकेला विचरण करता है, अशरीरी है, दूसरे की नजरों से छुपा (गुहा में) रहता है। जो इस चित्त को संयमित करते हैं, वे मार के बन्धन से छूट जाते हैं।
Wandering far, going alone, bodiless, lying in a cave: the mind. Those who restrain it: from Mara's bonds they'll be freed.
३८.
अनवट्ठितचित्तस्स, सद्धम्मं अविजानतो।
परिप्‍लवपसादस्स, पञ्‍ञा न परिपूरति॥

जिसका चित्त अनवस्थित (अस्थिर) है, वह सच्चा धर्म नहीं जानता, उसके चित्त की शान्ति घट जाती है और उसमें प्रज्ञा का पूर्ण उदय नहीं होता।
For a person of unsteady mind, not knowing true Dhamma, serenity set adrift: discernment doesn't grow full.
३९.
अनवस्सुतचित्तस्स, अनन्वाहतचेतसो।
पुञ्‍ञपापपहीनस्स, नत्थि जागरतो भयं॥

जिसका चित्त वासनाग्रस्त नहीं है, जिसकी चेतना विकारग्रस्त नहीं है, वह पाप और पुण्य से ऊपर उठ जाता है। जो जाग्रत है उसके लिए कोई भय नहीं है।
For a person of unsoddened mind, unassaulted awareness, abandoning merit & evil, wakeful, there is no danger no fear.
४०.
कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा, नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा।
योधेथ मारं पञ्‍ञावुधेन, जितञ्‍च रक्खे अनिवेसनो सिया॥

इस काया को मिट्टी के घड़े के समान जानकर चित्त को नगर के समान रक्षा करने के लिए प्रज्ञा के अस्त्र से मार का मुकाबला करो और इस तरह बचाये हुए चित्त में अनिवासी की तरह रहो।
Knowing this body is like a clay jar, securing this mind like a fort, attack Mara with the spear of discernment, then guard what's won without settling there, without laying claim.
४१.
अचिरं वतयं कायो, पथविं अधिसेस्सति।
छुद्धो अपेतविञ्‍ञाणो, निरत्थंव कलिङ्गरं॥

शीघ्र ही यह काया धरती पर चेतनाहीन होकर लकड़ी के क्षुद्र टुकड़े की तरह पड़ी होगी।
All too soon, this body will lie on the ground cast off, bereft of consciousness, like a useless scrap of wood.
४२.
दिसो दिसं यं तं कयिरा, वेरी वा पन वेरिनं।
मिच्छापणिहितं चित्तं, पापियो [पापियं (?)] नं ततो करे॥

एक लुटेरा दूसरे लुटेरे को , एक वैरी दूसरे वैरी को जितना नुकसान पहुँचा सकता है, गलत दिशा की ओर मुड़ा हुआ आपका चित्त आपको उससे भी अधिक नुकसान पहुँचाता है।
Whatever an enemy might do to an enemy, or a foe to a foe, the ill-directed mind can do to you even worse.
४३.
न तं माता पिता कयिरा, अञ्‍ञे वापि च ञातका।
सम्मापणिहितं चित्तं, सेय्यसो नं ततो करे॥

न माता, न पिता और न अन्य नातेदार ही आपका उतना भला करते हैं, जितना एक सम्यक दिशा की ओर मुड़ा हुआ चित्त।
Whatever a mother, father or other kinsman might do for you, the well-directed mind can do for you even better.
चित्तवग्गो ततियो निट्ठितो।

"Cittavagga: The Mind" (Dhp III), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी ानुवाद :राजीव

Friday, December 14, 2012

अप्पमादवग्गो



२१.
अप्पमादो अमतपदं [अमतं पदं (क॰)], पमादो मच्‍चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥

अप्रमाद (हमेशा होश में रहना, जागरूक रहना, गलती न करना) अमरत्व का पथ है। प्रमाद मृत्यु का पथ है। जो अप्रमत्त हैं, वे नहीं मरते। जो प्रमत्त हैं. वे मृत समान हैं।
Heedfulness: the path to the Deathless. Heedlessness: the path to death. The heedful do not die. The heedless are as if already dead.
२२.
एवं [एतं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] विसेसतो ञत्वा, अप्पमादम्हि पण्डिता।
अप्पमादे पमोदन्ति, अरियानं गोचरे रता॥

जो ज्ञानी हैं वे इस अप्रमाद के महत्व को विशेष रूप से समझते हुए अप्रमाद
में ही प्रसन्न रहते हैं। यही श्रेष्ठ जनों की मनोभूमि है- जिसमें वे निमग्न रहते हैं।
Knowing this as a true distinction,
those wise in heedfulness
rejoice in heedfulness,
enjoying the range of the noble ones.

२३.
ते झायिनो साततिका, निच्‍चं दळ्हपरक्‍कमा।
फुसन्ति धीरा निब्बानं, योगक्खेमं अनुत्तरं॥

धीर व्यक्ति  दृढ़ पराक्रम के साथ नित्य निरन्तर ध्यान में रहते हुए निर्वाण का स्पर्श करते हैं जो एक अनुत्तर (अनुपम) मुक्ति की स्थिति है। 
The enlightened, constantly absorbed in jhana, persevering, firm in their effort: they touch Unbinding, the unexcelled rest from the yoke.

२४.
उट्ठानवतो सतीमतो [सतिमतो (सी॰ स्या॰ क॰)], सुचिकम्मस्स निसम्मकारिनो।
सञ्‍ञतस्स धम्मजीविनो, अप्पमत्तस्स [अपमत्तस्स (?)] यसोभिवड्ढति॥

जो प्रगति की ओर अभिमुख हैं, जो जागरूक हैं, जिनके कर्म पवित्र हैं, जो सभी कर्म विचार पूर्वक करते हैं, जो संयत हैं, जो धर्म का जीवन जीते हैं और जो अप्रमत्त हैं, उनके यश में अभिवृद्धि होती है।

Those with initiative, mindful, clean in action, acting with due consideration, heedful, restrained, living the Dhamma: their glory grows.
२५.
उट्ठानेनप्पमादेन , संयमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरति॥

उत्साह और लगन से, अप्रमाद से, संयम और नियंत्रण से मेधावी व्यक्ति एक द्वीप बनाते हैं जिसे (विकारों का) कोई सैलाब नहीं डुबा सकता। 
Through initiative, heedfulness, restraint, & self-control, the wise would make an island no flood can submerge.
२६.
पमादमनुयुञ्‍जन्ति, बाला दुम्मेधिनो जना।
अप्पमादञ्‍च मेधावी, धनं सेट्ठंव रक्खति॥

मूर्ख और मंदबुद्धि प्रमाद में रत रहते हैं, जबकि मेधावी अप्रमाद की रक्षा श्रेष्ठ धन के रूप में करते हैं। 
They're addicted to heedlessness — dullards, fools — while one who is wise cherishes heedfulness as his highest wealth.
२७.
मा पमादमनुयुञ्‍जेथ, मा कामरतिसन्थवं [सन्धवं (क)]
अप्पमत्तो हि झायन्तो, पप्पोति विपुलं सुखं॥

प्रमाद में रत मत रहो। काम सुख से सन्धि मत करो। जो अप्रमत्त हैं, वे ध्यानस्थ होकर विपुल सुख प्राप्त करते हैं।
Don't give way to heedlessness or to intimacy with sensual delight — for a heedful person, absorbed in jhana, attains an abundance of ease.
२८.
पमादं अप्पमादेन, यदा नुदति पण्डितो।
पञ्‍ञापासादमारुय्ह, असोको सोकिनिं पजं।
पब्बतट्ठोव भूमट्ठे [भुम्मट्ठे (सी॰ स्या॰)], धीरो बाले अवेक्खति॥

जब ज्ञानी अप्रमाद से प्रमाद को दूर भगाता है, तब प्रज्ञा के ऊँचे भवन में आरोहण कर शोक मुक्त होकर दु:खी समुदाय को इस प्रकार देखता है जैसे कोई धीर पुरुष पर्वत की ऊँचाई पर पहुँच कर नीचे छूट गई भीड़ को देखता है।
When the wise person drives out heedlessness with heedfulness, having climbed the high tower of discernment, sorrow-free, he observes the sorrowing crowd — as the enlightened man, having scaled a summit, the fools on the ground below.
२९.
अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।
अबलस्संव सीघस्सो, हित्वा याति सुमेधसो॥

बुद्धिमान व्यक्ति प्रमत्तों के बीच अप्रमत्त होकर, निद्रानिमग्न लोगों के बीच अत्यंत जाग्रत होकर जीता है, ठीक वैसे ही जैसे दुर्बल अश्वों को पीछे छोड़कर तेज गति से दौड़नेवाला अश्व आगे निकल जाता है।
Heedful among the heedless, wakeful among those asleep, just as a fast horse advances, leaving the weak behind: so the wise.
३०.
अप्पमादेन मघवा, देवानं सेट्ठतं गतो।
अप्पमादं पसंसन्ति, पमादो गरहितो सदा॥

अप्रमाद के कारण इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना। हमेशा अप्रमाद की बड़ाई की जाती है, जबकि प्रमाद को गर्हित माना जाता है।
Through heedfulness, Indra won to lordship over the gods. Heedfulness is praised, heedlessness censured — always.

३१.
अप्पमादरतो भिक्खु, पमादे भयदस्सि वा।
संयोजनं अणुं थूलं, डहं अग्गीव गच्छति॥

जो भिक्षु अप्रमाद में रत रहकर प्रमाद से डरते हैं, वह अग्नि के  समान छोटे-बड़े बंधनों को जलाते हुए आगे बढ़ते हैं।
The monk delighting in heedfulness, seeing danger in heedlessness, advances like a fire, burning fetters great & small.
३२.
अप्पमादरतो भिक्खु, पमादे भयदस्सि वा।
अभब्बो परिहानाय, निब्बानस्सेव सन्तिके॥

जो भिक्षु अप्रमाद में रत रहकर प्रमाद से डरते हैं, वे प्राप्त ऊँचाई से नीचे नहीं गिरते। वे निर्वाण के अत्यंत निकट हैं।


The monk delighting in heedfulness, seeing danger in heedlessness — incapable of falling back — stands right on the verge of Unbinding.
अप्पमादवग्गो दुतियो निट्ठितो।
"Appamadavagga: Heedfulness" (Dhp II), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,
हिन्दी अनुवाद:राजीव

Friday, November 30, 2012

यमकवग्गो



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मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्‍कंव वहतो पदं॥
सभी क्रियाओं में मन पूर्वगामी है, मन की प्रधानता है। सभी क्रियाएँ मनोमय हैं। इसलिए जो प्रदूषित मन से बोलता या करता है, उसके पीछे दु:ख उसी प्रकार आता है, जैसे बैल के पैरों के पीछे पहिया।
Phenomena are preceded by the heart, ruled by the heart, made of the heart. If you speak or act with a corrupted heart, then suffering follows you — as the wheel of the cart, the track of the ox that pulls it.


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मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।

मनसा चे पसन्‍नेन, भासति वा करोति वा।
ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी [अनुपायिनी (क॰)]
सभी क्रियाओं में मन पूर्वगामी है, मन की प्रधानता है। सभी क्रियाएँ मनोमय हैं।इसलिए जो प्रसन्न मन से बोलता या करता है, उसके पीछे सुख उसी प्रकार आता है, जैसे कभी भी साथ न छोड़ने वाली छाया।

 Phenomena are preceded by the heart, ruled by the heart, made of the heart. If you speak or act with a calm, bright heart, then happiness follows you, like a shadow that never leaves.

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अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि [अजिनी (?)] मं अहासि मे।

ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति॥
उसने मेरा अपमान किया , मुझे मारा, मुझे हराया, मुझे लूटा- ऐसा जो बार-बार सोचते हैं, उनका वैर शान्त नहीं होता। 
'He insulted me, hit me, beat me, robbed me' — for those who brood on this, hostility isn't stilled.

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अक्‍कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे।
ये च तं नुपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति॥
उसने मेरा अपमान किया , मुझे मारा, मुझे हराया, मुझे लूटा- ऐसा जो बार-बार नहीं सोचते, उनका वैर शान्त  होता है

 'He insulted me, hit me, beat me, robbed me' — for those who don't brood on this, hostility is stilled.

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न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।

अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
यहाँ वैर से वैर कभी भी शान्त नहीं होता, अवैर से शान्त होता है- यही शाश्वत धर्म है।
Hostilities aren't stilled through hostility, regardless. Hostilities are stilled through non-hostility: this, an unending truth.

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परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा॥

वे यह नहीं जानते कि हम यहाँ मृत्यु के कितने निकट हैं। जो जानते हैं उनके सारे झगड़े शान्त हो जाते हैं।
Unlike those who don't realize that we're here on the verge of perishing, those who do: their quarrels are stilled.

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सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं।
भोजनम्हि चामत्तञ्‍ञुं, कुसीतं हीनवीरियं।
तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खंव दुब्बलं॥

जो इन्द्रिय सुख को शुभ समझकर इन्द्रियों का संयम नहीं करता, भोजन में मात्रा का ध्यान नहीं रखता, जो उदासीन और निरुत्साही है- उसे मार उसी प्रकार विनष्ट करता है जैसे एक दुर्बल वृक्ष को हवा। 
One who stays focused on the beautiful, is unrestrained with the senses, knowing no moderation in food, apathetic, unenergetic: Mara overcomes him as the wind, a weak tree.

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असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तञ्‍ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलंव पब्बतं॥
जो इन्द्रिय सुख को अशुभ समझकर इन्द्रियों का संयम  करता है, भोजन में मात्रा का ध्यान रखता है, जो श्रद्धावान और उत्साही है- उसे मार  विनष्ट नहीं कर सकता जैसे  हवा चट्टानों वाले पहाड़ को नहीं उखाड़ सकती।

One who stays focused on the foul, is restrained with regard to the senses, knowing moderation in food, full of conviction & energy: Mara does not overcome him as the wind, a mountain of rock.

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अनिक्‍कसावो कासावं, यो वत्थं परिदहिस्सति।
अपेतो दमसच्‍चेन, न सो कासावमरहति॥

जो संयम और सत्य से रहित हैं, जो विकार ग्रस्त हैं, वे काषाय वस्त्र धारण करते हैं तो वे उस वस्त्र के पात्र नहीं हैं।
He who, depraved, devoid of truthfulness & self-control, puts on the ochre robe, doesn't deserve the ochre robe.

१०.
यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो।
उपेतो दमसच्‍चेन, स वे कासावमरहति॥

जो संयम और सत्य से पूर्ण हैं, जिनका शील सुदृढ़ है - वे उस वस्त्र के पात्र हैं।

But he who is free of depravity endowed with truthfulness & self-control, well-established in the precepts, truly deserves the ochre robe.

११.
असारे सारमतिनो, सारे चासारदस्सिनो।
ते सारं नाधिगच्छन्ति, मिच्छासङ्कप्पगोचरा॥

जो असार को सार और सार को असार मानते हैं, वे मिथ्या संकल्पों में उलझकर सार प्राप्त नहीं करते।

Those who regard non-essence as essence and see essence as non-, don't get to the essence, ranging about in wrong resolves.

१२.
सारञ्‍च सारतो ञत्वा, असारञ्‍च असारतो।
ते सारं अधिगच्छन्ति, सम्मासङ्कप्पगोचरा॥

जो सार को सार और असार को असार मानते हैं, वे सम्यक संकल्पों के साथ सार प्राप्त करते हैं।

But those who know essence as essence, and non-essence as non-, get to the essence, ranging about in right resolves.

१३.
यथा अगारं दुच्छन्‍नं, वुट्ठी समतिविज्झति।
एवं अभावितं चित्तं, रागो समतिविज्झति॥

जैसे जिस घर का छप्पर ठीक से छाया न गया हो तो उसमें बरसात का पानी भीतर चला जाता है, इसी प्रकार अभावित चित्त ( अविकसित चित्त अर्थात् जिसने भावना या ध्यान का अभ्यास कर अपने चित्त के दोषों को दूर नहीं किया है) में राग  प्रवेश करता है।
As rain seeps into an ill-thatched hut, so passion, the undeveloped mind.

१४.
यथा अगारं सुछन्‍नं, वुट्ठी न समतिविज्झति।
एवं सुभावितं चित्तं, रागो न समतिविज्झति॥

जैसे जिस घर का छप्पर ठीक से छाया गया हो तो उसमें बरसात का पानी भीतर नहीं जाता है, इसी प्रकार सुभावित चित्त में राग प्रवेश नहीं करता है।

a well-thatched hut, so passion does not, the well-developed mind.

१५.
इध सोचति पेच्‍च सोचति, पापकारी उभयत्थ सोचति।
सो सोचति सो विहञ्‍ञति, दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो॥

इस लोक में शोक करता है, परलोक में शोक करता है, पापकर्म करने वाला दोनो लोकों में शोक करता है। अपने दूषित कर्म को देखकर वह व्यथित और व्यग्र होता है।
Here he grieves he grieves hereafter. In both worlds the wrong-doer grieves. He grieves, he's afflicted, seeing the corruption of his deeds.

१६.
इध मोदति पेच्‍च मोदति, कतपुञ्‍ञो उभयत्थ मोदति।
सो मोदति सो पमोदति, दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो॥

इस लोक में प्रसन्न होता है, परलोक में प्रसन्न होता है, पुण्कयर्म करने वाला दोनो लोकों में प्रसन्न होता है। अपने विशुद्ध कर्म को देखकर वह आनन्दित और प्रमुदित होता है।

Here he rejoices he rejoices hereafter. In both worlds the merit-maker rejoices. He rejoices, is jubilant, seeing the purity of his deeds.

१७.
इध तप्पति पेच्‍च तप्पति, पापकारी [पापकारि (?)] उभयत्थ तप्पति।
‘‘पापं मे कत’’न्ति तप्पति, भिय्यो [भीयो (सी॰)] तप्पति दुग्गतिं गतो॥

इस लोक में पछताता है, परलोक में  पछताता है, पापकर्म करने वाला दोनो लोकों में  पछताता है। मैं ने पाप किया- यह सोचकर पछताता है , दुर्गति प्रप्त कर अत्यधिक पछताता है।

he's tormented hereafter. In both worlds the wrong-doer's tormented. He's tormented at the thought, 'I've done wrong.' Having gone to a bad destination, he's tormented all the more.

१८.
इध नन्दति पेच्‍च नन्दति, कतपुञ्‍ञो उभयत्थ नन्दति।
‘‘पुञ्‍ञं मे कत’’न्ति नन्दति, भिय्यो नन्दति सुग्गतिं गतो॥


इस लोक में आनन्दित होता है, परलोक में आनन्दित होता है, पुण्कयर्म करने वाला दोनो लोकों में  आनन्दित होता है। मैं ने पुण्य किया- यह सोचकर आनन्दित होता है , सद्गति प्रप्त कर अत्यधिक आनन्दित होता है।

Here he delights he delights hereafter. In both worlds the merit-maker delights. He delights at the thought, 'I've made merit.' Having gone to a good destination, he delights all the more.

१९.
बहुम्पि चे संहित [सहितं (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] भासमानो, न तक्‍करो होति नरो पमत्तो।
गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्‍ञस्स होति॥

अनेक संहिताओं का पाठ करता है , लेकिन उसके अनुसार आचरण नहीं करता है, तो ऐसा प्रमत्त व्यक्ति दूसरे की गायों को गिननेवाले चरवाहे की तरह है- श्रमण की साधना में उसका कोई दखल नहीं है।
If he recites many teachings, but — heedless man — doesn't do what they say, like a cowherd counting the cattle of others, he has no share in the contemplative life.

२०.
अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति [होती (सी॰ पी॰)] अनुधम्मचारी।
रागञ्‍च दोसञ्‍च पहाय मोहं, सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।
अनुपादियानो इध वा हुरं वा, स भागवा सामञ्‍ञस्स होति॥

वह किसी संहिता का पाठ नहीं करता है , लेकिन धर्म के अनुसार आचरण  करता है, तो राग दोष और मोह छोड़कर सम्यक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न विमुक्त चित्त वाला व्यक्ति यहाँ या वहाँ कहीं भी न चिपकते हुए  श्रमण की साधना के योग्य है।


If he recites next to nothing but follows the Dhamma in line with the Dhamma; abandoning passion, aversion, delusion; alert, his mind well-released, not clinging either here or hereafter: he has his share in the contemplative life.

यमकवग्गो पठमो निट्ठितो।

"Yamakavagga: Pairs" (Dhp I), translated from the Pali by Thanissaro Bhikkhu. Access to Insight, 29 April 2012,http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/kn/dhp/dhp.01.than.html . Retrieved on 26 November 2012.

हिन्दी अनुवाद: राजीव